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अपनी खामोशियाँ खोजे

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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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रविवार, 22 अप्रैल 2018

चित्र

अब देख रहा हूँ तुझे मेरी फिक्र नहीं है,
इस बदले लहज़े में अपना ज़िक्र नहीं है।

गुलाब आज भी महकता पुरानी डायरी से,
बहुत खोजा इसके पास कोई इत्र नहीं है।

बहुत सारे कदम तो मेरे भी उसने चले हैं,
ऐसे कैसे कह दूं कि वो मेरा मित्र नहीं है।

जो दीवारों पर टंगा वो बसा है यादों में,
काठ के खांचों का बस एक चित्र नहीं है।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(22 - अप्रैल - 2018)(डायरी के पन्नो से)

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

लप्रेक 12



धूधली सी शाम में श्याम के कंधों पर सर रखकर बैठी थी। काफी देर तक की खामोशी को चीरते हुए, नीतू नें आसमान में आकृति दिखाते हुए कहा चलो न उस बादल के पीछे चले।

एक बादल से दूसरे पर आइस-पाइस खेलेंगे। तुम सूरज ओढ़ लेना मैं चाँद पॉकेट में छुपा लूँगी। फिर अदला बदली करेंगे दोनों का। ले जाऊँगी बहुत दूर मेरी नानी के गाँव में ये चाँद गड्ढे में छुपा दूँगी। फिर चाँद दिन पूरी करने ना आएगा।

और मैं तुम्हारे साथ यहीं पूरे एक दिन एक सौ बरस जैसे गुज़ार दूँगी।

© खामोशियाँ - 2016 | मिश्रा राहुल
(06 - अप्रैल - 2016) (डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

डायरी का डिजिटलीकरण

कभी
डायरी थी
तो कलम था,
कभी ठहरा
हुआ सा मन था।

डेहरी थी
लालटेन टांगे
कंधों पर,
ऊपर याद था
उनका मगन सा।

शाम
की छांव में
कुछ नज़्म होंठों से
सीधा कार्बन कॉपी
होते थे पन्नो पर।

आजकल
चमकते सेलफोन पर,
बटन के दाने चुंगते हैं
यादों के कबूतर।

डायरियां जैसा
भरता नहीं पन्ना इसका,
इसमें खुशबू भी नहीं
किसी भी नज़्म के इत्र की।

तारीखें सिग्नेचर,
से मिलानी पड़ती।
कभी लिखावट से
पहचान लेते थे
तबियत नज़्मों की।

कभी
जब होती है,
चर्चा नज़्मों की।
खुल जाती चमचमाती
स्क्रीन पॉकेट से निकलकर।

और दूर पड़ी
रैक पर डायरी
घूरती रहती है मुझे।

- मिश्रा राहुल | 04- अप्रैल -2018
(डायरी के पन्नो से)(खामोशियाँ-2018)

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

अंजान

तलाश कर शागिर्द अपना तू अंजान थोड़े है,
अपने शहर में घूम रहा तू मेहमान थोड़े है।

आ जाएगी रोशनी अपना रास्ता बदल कर,
तेरे घर में बस एक ही रोशनदान थोड़े है।

कभी दिल से उछालो किस्मती पत्थर यारों,
हर छत पर बस एक ही आसमान थोड़े है।

खिलते नहीं हैं फूल पत्थर की तासीर पर,
ये किसी का आंगन है तेरा बागबान थोड़े है।

- मिश्रा राहुल | खामोशियाँ-2018
(डायरी के पन्नो से)(09/मार्च/2018)

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

टेपरिकॉर्डर

अपने पुराने
काठ के टेपरिकॉर्डर में
कैद करके रखी थी,
कुछ पुरानी
चुनिंदा नज़्में।

हर रोज
उसके सर पर,
टिप मारकर
जगाता था।

सुर
निकलती थी,
सामने सफेद
प्याली से टकराकर
गूजती थी बातें उसकी।

हर रोज नई नज़्म
अपनी छाप छोड़ती।
लेकर बैठता था
खाली प्याली अपनी।

हो जाती
कभी सौंधी सी,
तो कभी भीनी भीनी सी।
कुछ नज़्म
आँखे दिखाती,
तो कभी हो जाती तीखी सी।

अब
टेपरिकॉर्डर भी
रिवाइंड नहीं होता,
फंसता है उसका
पांव आजकल।

कुछ
नज़्म बोलता,
कुछ पर गला
फंसता उसका।

कैसेट से
उसकी बनती नही।
रील्स उलझकर
उसके गर्दन कसती हैं।

सोच रहा हूँ,
बेच दूं पर खरीदेगा कौन।
यादों से भरा इतने
वजन का टेपरिकॉर्डर।

- मिश्रा राहुल | खामोशियाँ
(03-मार्च-2018)(डायरी के पन्नो से)

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

फागुन क बदरा (भोजपुरी)

फागुन क बदरा,
झूमत बा रे।
पासे बैठावे खातिर,
क़हत बा रे।।

उड़ाई क गुलाली,
जरा ए बाबू।
नजरिया मिलावे खातिर,
क़हत बा रे।।

झूमी झूमी खेतिया मे,
रंग छितराये,
लाली लाली गालिया मे,
बसत बा रे।

गोरी गोरी मूहवा पे,
चढ़त रंगवा।
बरवा लटियावे खातिर,
पुछत बा रे।।

खोजत बा आपन,
पुरान बालम देख।
रंगवा से नहवाए क,
खोजत बा रे।।

मीठ मीठ चढ़ल बा,
कराही चूल्ही प।
जउन जउन पकवान,
बनत बा रे।।

फागुन क बदरा,
झूमत बा रे।
पासे बैठावे खातिर,
क़हत बा रे।।

- खामोशियाँ (मिश्रा राहुल)

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

इस्तेहार

प्रेम में इश्तेहार बन बैठे हैं हम,
भोर के अखबार बन बैठे है हम।

सब पढ़ते चाय की चुस्की लेकर,
हसरतों के औज़ार बन बैठे हैं हम।

कितनी सुर्खियां जलकर ख़ाक हुई,
सोच कर यलगार बन बैठे है हम।

बदल जाता मुसाफिर हर सफर में,
काठ के पतवार बन बैठे हैं हम।

- खामोशियाँ
(17-दिसंबर-2016)

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अरमान

यूँ राख हुआ था अरमान जलते ही,
कोई मिल गया था मुझे निकलते ही।

लोगों के पॉकेट की तलाशी लीजिये,
वो चाँद दिखा था मुझे साँझ ढलते ही।

दोनों हाथ सने थे लाल दस्तानों से,
ख्वाब दिखा था मुझे हाथ मलते ही।

ढूंढता गया कितने मुखौटे उतार कर,
उससे मिलना था जो मुझे चलते ही।

कितने नक्शे बदले तुझे खोजने में,
हर मोड़ खड़ा था रास्ते बदलते ही।

- मिश्रा राहुल (0९-दिसंबर-२०१७)