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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

यादों की अंगीठी....

आँखें कोरी थी और कोई बसता गया..
बिछड़े ऐसे की मन मसोसता रहा..!!

फटे ख्वाब की लुगदिया भरी जेबों में..
कोई संजोता गया मैं बिखेरता रहा..!!

जो सबपे बोझ था कहीं छूट गया..
रात निकलती गयी दिन ढलता रहा..!!

कोई और असर था प्यार के साथ भी..
वादे गिनते रहे सफ़र कटता रहा..!!

अँधेरी रात में डाकू दिखे आते..
जुगनू सोये रहे घर लुटता रहा..!!

बचा ना कुछ जली यादों के सिवा..
अंगीठी तपती रही वक़्त सेंकता रहा..!!

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

सूरज की रजाई...!!!



जाने कबसे छुपा था अलाव जला के..
निकल आया आज देख बादल ओस बना के..!!

सो रहा हैं सूरज अभी तक रजाई में..
कोपले भी उदास हैं आखों पे आंसू सजा के..!!

रुमाल उठाये चलती हवाएं पोछने को..
पर थामे हैं अक्स जमी दर्द जला के..!!

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

कोहरे की रजाई...!!!

कोहरे की रजाई में लिपटी...
सुबह भी आज कुछ अलसाई हैं...!!!

बड़ी देरी से सोकर उठा सूरज भी...
उसकी चमक अभी तक...
खिड़कियों के दरक्तों में मौजूद हैं...!!!

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

खिड़कियों से झांकती बयार....!!!


इन सर्दियों के मौसम में ट्रेनों में यात्रा करने का अनुभव की अलग होता...ट्रेन झूमते हुए चलती बचकानी हरकते करते...उसपे हलकी ठंडी बयार आ जाती जुल्फों को सहलाने...आहा कितना गजब का अनुभव होता अब क्या बताये ....!!!
बड़ी तेज़ी में भागते इन सर्द डिब्बो से,
देख कैसे लुका छीपी खेलती हैं बयार..!!

बता रखा हैं शीशों से ना मिलने को,
फिर भी टकरा कर जान दे रही हैं यार..!!

अब जाके कौन समझाए उन्हें कि,
ये खेल रात में नहीं खेलते हैं बार बार..!!

बुधवार, 28 नवंबर 2012

मरहम का वो इन्हेलर...!!!

दिल के दहलीज पर देख तो सही...
हर वक्त ही कोहरा जमा रहता...!!!

कितने यादों के छींके आ जाते जिन्हें...
बहानो के रुमाल से पोछ जाया करते...!!!

कभी कभी तो जाम कर जाते हर वो...
रास्ते दर्द के अब कहा से ला दे...

!!!...मरहम का वो इन्हेलर...!!!

शनिवार, 24 नवंबर 2012

एहसास...!!!

ठण्ड लग गयी और शायद हाँ छू गयी एक एहसास...किसी कि भीगी जुल्फों की...हाँ गुनाहगार हैं मेरी वो सब सीतलहरें...जिन्होंने टाफी खा के मुह लभेड रखा हैं उनके अक्स से...!!!
धूप उतरती कितने सैन्यारो को लांघते...
अजीब सी उलझन थामे रखती जेहन में...!!!

हलकी मुलायम गुदगुदाती हुई देख...
कभी गिर पड़ती एक जगमगाते कांचे पर...!!!

लोग भूल जाते उन्हें शायद..
तभी ग़लतफहमी में कांचे उठा लेते...!!!

अब्र तो खड़े कि कब बरस पड़े पर..
उससे पहले ओस समां धुधला कर देती...!!!

जाने कैसा लगता जहाँ क्या बताऊ...
कोई पतली शीशी में पानी भर रहा मानो...!!!

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

चांदनी


वो मंजर भी कितने मुख़्तसर रहते ..
चांदनी उतरती झील में लोग ताकते रहते ..!!

मेरी सल्तनत भी अकेली रात में ठिठुरती ..
जब अँधेरे राज करते और उजाले झांकते रहते ..!!

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

फिर अकेली दीवाली...!!!

बज रहे पटाखों की साज में भी ..
खिरोचते हैं ये तन्हाइयों के नाखून ..!!

रंग बिरंगे चद्दरों की राज में भी ..
तरासते हैं ये रंगोलियों के सकून ..!!

फफकते सम्मो की आवाज में भी ..
ढूंढते हैं परवानो के खून ..!!

चाचा स्पेशल...!!!

Who come forward to nab these situation but unfortunately everyone is still busy in their satire..!!!Wow..Youth Nation is busy in useless..!!!! 
सड़के चौराहे हैं बच्चो से लदे...
फटे पुराने थामे चिथ्थडों से सजे ..!!

कटोरी टूटी ... किस्मत फूटी
कौन कहता की वो हैं चाचा के सगे ..!!

सोमवार, 12 नवंबर 2012

टूटे दिए...!!!

एक शाम निकला लेने दिए...अब क्या बताऊ पड़ गयी नजर उन टूटे दीयों पर...पूछ बैठा कुम्हार साहब से इन दीयों को कोई ले ना गया क्या...अब क्या होगा इन दीयों का...!!!
क्या इनकी किस्मत में टूटना ही होता...!!!
दूर खड़े मुस्काते वो पुराने दिए...
दिखते कभी ना लोग जिन्हें लिए ...!!!

कुम्हार की पसीनो का इत्र लगाए ...
तड़पते रहते किसी परवाने लिए...!!!

कितनी दीवालियाँ गुजारी अपनी उम्र में ..
पर जल ना सके लोगों को जलाने लिए ..!!!

देखते जा अंजाम क्या उसका ..
अभी तो कोने में लेटे हैं वो टूटे दिए ..!!!

©खामोशियाँ 

बुधवार, 7 नवंबर 2012

जिंदगी की रसगोली...!!


बस एक नज़्म तलाशता अचानक घुस गया हूँ...
जिंदगी के जंगल में...!!!

दोनों हाथो से पकड़ के दाँतों से छीला हैं उसे...
अब अधर में हैं वो...!!!

गा सकता नहीं और शायद निगल भी सकता नहीं...
अब तो मुह में रख...!!!

किसी रसगोली की तरह चबा रहा हूँ कबसे...
आँखों की मिठास देख.. !!!

मन्नतें...!!!


कई मन्नतें आके चिपकी बैठी हैं गेसुयों से...
बार बार उसे उठाकर लगाते कानो के पीछे तक...!!!

पर इन जुल्मी हवाओं को कैसे समझाए...
उड़ा ले जाती यह सारी आयतों से लिपटी जुल्फे...!!!

अब बस इन्तेजार हैं एक अजब "आकृति" का...
जो आके आखों में बालों के भीगे-छीटें मार जाए...!!!

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

करवा चौथ स्पेशल...!!!

अर्शे से ना देखा वो भी एक बार झांक आया...कि चाँद फलक पर लटका हैं या नहीं...सही हैं एक प्यास के मारे उचक उचक के देखते ही रहे आज !!! 
धूल से धुधली पड़ी शाम की अलसाई किरने ... 
उसके इर्द गिर्द पहरा देते कुछ लफंगे अब्र ... !!! 

तन्हाई के दामन में चिपके हैं कुछ राज ... 
चलनी से देखे तो दिखेंगे वो जख्म चाँद के ... !! 

पर शायद आज न आ सकेंगे वो बूढ़े चाचा ... 
धुधिया लालटेन थामे चमकाने फलक को ... !!!

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

आईना...!!!

इन आएनो में अब वो कुर्बतें भी नहीं,
अक्स झांकता हैं बहार पर दिखता ही नहीं .. !!

कुर्शिया भी तलाशती बैठने किसी को,
मेहमानों में कभी वो नजर आता ही नहीं .. !!

पलटते चले गए पन्ने अखबार के,
इश्तिहार बनी ज़िन्दगी से अब वास्ता ही नहीं .. !!

धुवे लादे हुवे अब्रा पसरे फलक पर,
परिंदों को कोई रास्ता दिखलाता ही नहीं .. !!

चाहते भटक जाए इन घने जंगलों में,
पर कोई शाम को वहा जाने देता ही नहीं...!!!

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

सुबह की चुस्की...!!!

आज काफी दिन बाद भोर में ही नींद खुल गयी अब क्या था महसूस होते गया हर वो आलम जो प्रकृति मजे ले रही थी और उठा लाया अपनी कलम दवात साजाने को हर वो मंजर जो सुबह की चुस्की ले रहा...!!!
आज सुबह भी सर्द अंगडाईयाँ लेती
दुबुक गयी अब्र की रजाईयों में..!!!

सूरज भी उठा देर से थामे
रंगबिरंगे मंजन सजाये ब्रश पर....!!!

बयार आ गयी सुबह थामे बर्फीले अक्स
जैसे लिए हो सुबह की अलार्म घडी...!!!

रात को देर हो गयी थी सोने में
देख तभी निशा जाने का नाम न ले रही..!!!

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

कागज़ का बहिस्कार...!!!

दुनिया जितनी ही आभासी प्रतिबिंब की तरफ अग्रसर हैं उससे तो यही प्रतीत होता की बहुत जल्द ही बच्चे A B C D और क ख ग घ सीधा इन्टरनेट के माध्यम से सीखेंगे...वाह क्या आलम होगा...बताता हूँ..लोगों के हाथो में मोबाइल या टैबलेट होगा...उंगलियां बटनों पर अचानक टपका करेंगे...लोग भूल जाएंगे अपनी लिखावट...शायाद उनके पास अपना जैसा कुछ ना होगा...याद करने खातिर कागज़ ना होगा...!!!
नन्ही उंगली जब कागज़ पकड़ती थी...
पेंसिल तरह सपने भी गढा करते...!!!

हर तरह की आडी तिरछी घुमाते..
नोक टूटे ही रोते गुस्साया भी करते...!!!

अजीब हैं यह कागज़ का टुकड़ा देख
जैसे अनजान लोगो से दोस्ती करते ...!!!

मार्कशीट हो या शादी का कार्ड..
उसी की सुगंध में डूब के नहाया करते...!!!

जाने कितने गुलों की खुसबू थामते...
उन्हें संजो के रोज आंसू सुखाया करते...!!!

मेडिकल स्टोर....!!!

मैं खड़ा था एक मेडिकल स्टोर पर कुछ देखा ... !!!
काफी भींड भाड़ सी थी ... कोलाहल रंग बिरंगी... गोलियाँ ... कैप्सूल ... टैबलेट खरीदते लोग ... !!!
उफ़ कितनी सांसत में जीते ... जीवन का मैखाना भी अजब हैं ... साकी तैयार हैं पर पैमाना ही नहीं हैं... !!!
एक पीले पुरानी पर्ची थामे...
कुछ गोंजा गया हैं उसमे ... !!!

अजीब लिखावट थी कोई ...
जैसा दर्द वैसी ही लिखावट भी ... !!!

कोई पढ़ाना चाहे तो भी पढ़ा
ना सके किसी को वो बेरुखी ... !!!

पर एक आदमी कोशिश कर रहां ...
हाँ यह हैं ऊपर के दूसरे बर्जे पर ... !!!

सामने चमकीले पत्ते में लिपटी ...
रख दिया हरी नीले पीले गोलियाँ ... !!!

कुछ भूल आया मैं शायद वहीँ पर ...
हाँ हाँ पर्ची पर अब देर हो चुकी हैं .... !!!

कोई उठा ले गया जैसे पर खैर ...
उसे भी वही दिक्कत होगी लगता हैं ... !!!

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

सूरज का जन्मदिवस .. !!!

सबके जनम दिवस पर बधाइयां लिखते लिखते यूँ ही सोचने लगा की अगर सूरज जन्मदिन मनाये तो उसमे आखिर क्या...कमी रह जाएगी...उसे बता नहीं सकता बस लिख सकता हूँ भावनाओं की आवा पोह को जेहन में से ... !!! 

हवाओं ने फुक मारा के फूल गया गुब्बारा..
बाँध दिया उसके सिरे को पहाड़ों के टीलों से ..!!

बड़े ख़ुशी से उड़ते अब्र उसकी मांघ झाड रहे ..
पक्षी भी चल दिए लोगों को न्योता बाटने ..
चमकती बिजली लिए तैयार बर्फ का केक काटने को .. !!

कोई अकेले बैठा था मुरझाये एक कोने में ..
पर मना न सकता कोई उसको आने खातिर .. !!

उसके आते पिन लग जाएगी गुब्बारे में ...
निशा ओह्ह निशा मुमकिन नहीं बुलाना .. !!

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

यादों का बुकमार्क...!!!


अभी एक किताब निकाली थी पढ़ने खातिर दराज से देखा कुछ चिपका हुवा था किताबों के बीच में रंग बिरंगा...धागों से लिपटा...अंग्रेजी में बुकमार्क की संज्ञा दी जाती उसको..!! अब पढूं क्या मैं सोचने लगा काहे लगाते इनको...उसी सोच ने कुछ बना दी लाइने पढ़िए आप भी...!!!

किसी कसी दराज में रखी किताब...
बड़ी अकेली सिमटे पुरानी जिल्द में...!!!

जाने कितने बुकमार्क बाहर निकले...
शायद कई सिलवटें अपने में दबाये...!!!

लाल...नीले...पीले...चिपके एक में..
कौन समझे किसकी खातिर कौन से हैं...!!!

कोई पृष्ठ भी मुड़ा हैं बीच में...
जाने क्यूँ आखिर उसके आगे सफ़ेद क्यूँ हैं...
किरदार सहित काले अक्षर भी लापता...!!!

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

ट्रेन की यात्रा...!!!




सूरज छतरी ताने चल रहा बगल में ,
एक तूफान पर औंधे मुह लिपटी ट्रेन ..
हर मंजर हर जगह पीछे छूट रहे.. !!

बस साथ चल रही वही तन्हाई के अब्र..
कितने अन्शको के सैलाब अपने जिगर में लपेटे ..
टपका रहे हमे ओस की बूंदों में घोलकर .. !!

हौले हौले एक खून से लतपथ लाल साँझ भी ...
डूब रही हैं धीरे धीरे .. !!

और रात भी खामोसी से आ गयी ओढ़ ढाँप के..
कोई शायर खोज रहा धुधिया रौशनी ..
कोई बता दे उसे कि आज अमावस हैं .. !!

वरना खामखा आंखे बिछा कर रखेगा...
पुरानी खटोले पर सोये टकटकी लगाए .. !!

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

यादों को धोया...!!!


यादो के दाग थामे दामन पुराने...
सुबह ही तो धोया था सर्फ़ से...!!!

जाने किनती मस्स्कत के बाद...
सुखाया टाँगे झूलते अरगनी पर...!!!

चिमटी भी लगाया कि उड़...
न जाए किसी दूसरे कि छत पर...!!!

इतनी सिलवटें हैं कि कितनी इस्त्री करे...
शायद कितना भी धोने पर नहीं जाते..

कुछ पुराने यादों के चकते...!!!

इतना आसान ही रहता भुलाना तो..
खुद बदल न लेता यादो से सनी कमीज...!!!

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

दराज के आंशु ...!!!


एक अर्शे से रखी थी दराज के कोने में .... वो आयातों की किताब .. !!
आखिर क्या जफा हुई पकड़ न सका ...वो आयातों का सैलाब .. !!

इन मुक्कादारों ने भी जाने कितने खीरोचे दी ए दोस्त ,
ज़ेहन में लगे महीन धागों को लहू बना गया वो ख्वाब .. !!

देख कैसे पालथीमार के बैठे हैं हर्शू ग़मों के अब्र ,
कितनी बरसातों बाद निकल पाएँगे मेरे चेहरे के टूटे नकाब .. !!

एक कोने के फोल्डर में...!!!



आज जा पंहुचा पुराने एक पुस्तक मेले में बड़े कम चेहरे थे ... अवाक रह गया मैं यह देख कर ... इतनी दुर्गति हो चुकी हैं साहित्य कि ... कभी हलचल जमती थी इन्ही मेलो में ... अब क्या बताए कितना आगे पहुच चूका ये समाज कि पूरे लाइब्रेरी को एक फोल्डर में समेटे बैठा हैं .. हमारे मित्र विभव कुमार ने कहा कि ले राहुल क्या मैं यह पुस्तक उठा लूँ...मैं भी तपाक से कहा क्या लेगा यह तो मेरे पास एक कोने के फोल्डर में पड़ी हैं...जी हाँ "एक कोने के फोल्डर में..."....!!!

"एक कोने के फोल्डर में..."
बड़ी उदास नज़रों से ताकती
एक नीचे कि रैक में पड़ी....धुल भरी किताबें....!!!

जिनसे मुखातिब हुए देख...
जमाने हो चुके हैं...
शायद "एक कोने के फोल्डर में "
पड़ी उसकी सौत की वजह से...!!!

अक्सर जुम्मा इनकी
शोहरत में गुजरा करता था...!!!

किताबों में भी गुल साथ
तस्वीर छुपाये जाते थे...!!!

अब तो आ चुके चमकते स्क्रीन पर...
पन्ने पलटने जगह क्लिक करते...!!!

शायद इंसान की उंगलियां भूल गयी..
वो एहसास जो पन्ने उलटने में
जमती थी...शायद....हाँ...!!!

उस "एक कोने के फोल्डर में..."
क्या क्या रहता कौन जाने...!!!

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

ओह लकडहारे.....!!

बड़ी बेरहमी से उजाड देते पेडो से भरी बस्तियां...कुछ बूढ़े तो कुछ जवान पेड़ ऐसे काट दिए जाते मानो उनका अस्तित्वा ही नहीं था कभी भी...हाय रे लकडहारे सुन रे लकडहारे...!!!
ओह लकडहारे.....!!
कुछ दूर एक बूढी चट्टान पर .. !!

नजर लगाये बैठे
कुछ लोग ..
एक पुराना पेड़ जैसे दोपहर को खाके .. !!

लेता हैं पाँव पसरे .. अचानक लोग उठा ले गए उसे ..!!

देख कैसे अकेला तड़प रहा उसका अक्ष ..!!

किसीकी आरी और कुल्हाड़ी से निकले लाल पानी ..
से मुह धुल रहा था शाम तलक उठाकर .. !!

ज़रा सा भी वो पहचान ना सका ..

कि यह उसी का लहू हैं जिसमे

डुबकी लगाकर अभी अभी निकला हैं वो .. !!

सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

रात की थाल


अभी खाना खाने बैठा था की लाइट चली गई जो की उत्तर प्रदेश की आम बात हैं .. अब शायद इस धुधिया रौशनी में मैं खा कम और सोच ज्यादा रहा था...कुछ अजीब किसे लिखने पर शायद कुछ रचना का निर्माण हो जाए ... तो बात दे आखिर सोचा क्या हमने ...!!!
वक्त के चौके पर निशा .... कैसे बेल रही रोटी ... !!!!!
फुलाने को दबाये की धुधिया रौशनी थामे...
चमक गयी काली तवे पर .... !!!
बादलों में गुम होती जाती जैसे ...
एक नन्हा बच्चा
रात और दिन ...दिन और रात खेल रहा हो ... !!!
थाल भी सज गयी हो ... !!!
पर अचानक देखो ...उलट गयी थाली ....
चावल के दानो तरह सितारे छींटा गए पूरे फलक पर ... !!!

शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

शायर...!!!

किसी जलते शहर में कभी से बैठा था शायर,
गजलों को पुडिया बनाकर फेका था बहार...
किसी ने गिरते लफ्जों को इस कदर संजो लिया था,
मानो उड़ते धुएं तलक चेहरा ढाप रहा था शायद...
कितने आईने बदन पर धंसाए बैठा वो,
फिरभी खुद में खुद ढूढने में नाकाम रहा था शायर...!!

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

एक ही ख्वाब...!!!


नजरें बंद होते ही बस एक ही ख्वाब से मैं परेशान हो गया हूँ...जैसे किसी तकनिकी को समझाने लिए प्रमेय की आवश्यकता होती....शायद उसी तरह किसी भावनाओं को व्यक्त करने खातिर पुराने बुद्धिजीवियों ने कविताएँ का निर्माण किया...मैं इस कथन से कतई सहमत नहीं की "मुझे शायरी आती नहीं...मुझे कविताएँ में रूचि नहीं...इनमे रची न रखने वालों ने फिर असल मायनों में जिंदगी जी ही नहीं...चलिए ख्वाब से रु-बा-रु तो करा दु अपने...!!!
एक ही ख्वाब...!!!
एक ही ख्वाब चला आता बेवक्त धूल मिट्टी से लिपटा हुआ...
शोर के मुरझाये गुल बालों में खोसे बहक के चलता हुआ...!!!
साँसे फूल रही उसकी आखों तक पहुँचते पहुँचते
भागता दौड़ता आखों में चिपका दीवारों से टकराता हुआ...!!!
दिखा यूँ की चली आई "आकृति" बलखाते हुए...
कमर में उरस कर चाबी की गुच्छी झनकाते हुए...!!!
एक खुशी अपनी बालों में लगा के घुमती देख...
पहुच गयी चेहरे तलक बालों का रस टपकाते हुए...!!!
रूठी तो लेट गयी फर्श पर मुह फुलाए...
तो कभी फर्श से मुझे गोद में बिठाती बहालाते फ़ुस्लाते हुए ...!!!

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

चाँद थाल में...!!!


कभी था पर कभी उसे ना पता हैं,
छोटी छोटी बातों में क्यूँ मद खपाता हैं...!!

एक सांझ रोज आती घूँघट काढ़े,
क्यूँ ना तू उसे अपने लिए मनाता हैं..!!!

देख रोज चाँद भटक आता यहाँ पर,
क्यूँ ना तू उस रौशनी में नहाता हैं...!!!

जिंदगी तो ठहरी मजदूर जन्नुम की,
क्यूँ ना तू कटोरे में रोटी प्याज सजाता हैं...!!

बूढी इमली पीछे दुधिया टोर्च थामे रखता,
दिन ठीक हैं वरना यह चाँद भी लडखडाता हैं...!!!

तडपती मछलियाँ....



उनकी दूरियों से भली तो नजदीकियां थी,
कितने बादलों से लिपटी उनकी बस्तियां थी...!!!

बस चले जा रहे यूँही कही घूमते हुए,
गर्दिशों से बड़ी तो जिल्लतों की कस्तियाँ थी...!!!

एक अजब सी बिजली को झेल रहा था,
यूँ निकलती आइनों से उभरी "आकृतियाँ" थी...!!!

जाने कितने लाशों को लादे चल रहा था मैं,

पहुंचा जब तालाब तलक तो देखा ए दोस्त,
गठरी में मरती तड़पती मछलियाँ थी...!!!

अलसाई सी धूप...!!!


एक बड़ी अलसाई सी धूप
बालों को सहला रही ...!!!

अजीब रंगत थामे वो
जुल्फों में उलझा रही ..!!!

दिन भर
पसीने से तर बतर देख.

अपने बाजुओ में
जाने कितने रंग गुदवा रही ..!!!

एक अजीब रात...!!!


आज यह रात भी आ गयी ... !!!

जैसे हो किसी घने बगीचे के...

पेडो कि ओट लिए छुपते छुपते...!!!

लगता हैं बादल की जेब से..

चाँद की चमकती अठन्नी चुराई हैं..!!!

वही फटी पुरानी काली शाल लपेटे...

चल पड़ी हैं मेले में गुम होने को...!!!

अब यह सन्नाटे इसकी...

आखों में धूल जैसे चुभ रहे...!!!

कोई बुला तो दे उन झीगुरों के..
टोलियों को कहा गायब हो गए...!!

एहसास:..!!

हर बार कभी अकेले बैठे नजर हर कोनों को अपनी ओर आकर्षित करती...!!!
या कहे किसी वातानुकूलित कैप्सूल में बैठे ढके हो कितने रंगीनियों से...!!!
पर दर्द से कराह रही नसों में कौन जान फूंके...!!!
आखें तड़प रही जिसके पूनम के चाँद की उसे कौन झील में परोसे...!!!
बस बयार को समझा दे कोई की उसके अक्स को तंग न करे...!!!
 —

सोमवार, 24 सितंबर 2012

बेटी दिवस स्पेशल...!!!

 
अम्मा आपके कोई बाल-बच्चे हैं...एक तडाक से आवाज आई...
बाल-बच्चे तो कोई नहीं हैं...बस तीन बेटियां हैं..!!!!
यह बात परिलक्षित करती है हमारी मानसिकता और सामाजिक स्थितियों को...भारतीय मां-बाप बेटियों को अपने सहारे के रूप में गिनकर नहीं चल सकते,
उन्हें पराई मानकर ही पाला जाता है..!!!

माथे पर टीका और थामे हाथ में झुनझुना...
लाल सूरज में अध्मुयीं सीपों सी जल रही...!!!
किरने भी फाक रही उसकी लटों की गोलियाँ...
भूल गया समाज देख बयार कंघा कर रही...!!!
लोग पुनमिया रात हुए भागे जैसे पिंड छुडाकर
देख यह अमावसी रात ही लोरी सुना रही...!!!
इतनी उल्फतों के फुहारे आर पार हुए फिर भी...
दिन भी हार गया और यह रण जीत रही...!!!
मुकद्दर रिसता आ गया ख़ाक के समुन्दरो से...
पर देख आज भी उन्ही तहखानो से लड़ रही ...!!!


कल बेटी दिवस पर लिखी गयी हमारी कुछ पंक्तियाँ पसंद आये तो सूचित करे..!!

पूनम की रात...!!!


आज बैठा एक झील पर शाम हुए कुछ सोच रहा था...लोग अनर्गल कहते जिसे...पास था कुछ पर्चे के टुकड़े पर...एक पुरानी नीब की पेन से...छिडक छिड़क के लिखा हूँ...कुछ...!!!
इस अधेरे में भी वो....
सिसकियाँ मौजूद रहती हवाओं में...!!!

जो धुएं से लिपटे चाँद में नहाती...
हुई बह जाती हैं किसी झील में...!!!

आहट भी लहरों में...
धमनियों जैसी फडकती रहती...!!!

कोई आला थामे आये और...
नाप जाए उनको एक लिखावट में...!!!

उस पर जलकुंभी ओढ़े...
बैठी सुबह झाकती चाँद को...!!!

अपने दर्द को बयान करने खातिर..
टकराकर लौटती बार बार...!!!

पर रोक रखती अपने जेहन में
दाबे जख्मों को ताकि निहार ले..
इस पूनम की रात को फिर आये न आये...!!!

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

जिंदगी...!!!


बिन चिरागों में बैठी अमावसी रात जैसी,
दुनिया भी एक दुल्हन हैं सताई हुई...!!!

एक जेठ की तपतपाती धुप जैसी,
मेरे मजार परके फूल सी मुरझाई हुई...!!!
उन किरणों की तबस्सुम को लपेटे,
हंसी होंठों पे लाके दबाई हुई...!!!
हर मुखड़ों को ये किताबी झलकती,
कितना किताब्खानो में भरमाई हुई...!!!

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

प्यार का गुल...!!!


गुल सम्हाले रखे हैं बस इन्तेजार हैं उनका,
पलके बिछाए बैठे हैं बस ऐतबार हैं उनका...!!!


हर पल साख से टूटते पत्ते बिखरते धरा पर,
कि दर्द नहीं वो तो बस प्यार हैं उनका...!!!


एक अर्शे से सुनने को तरस गयी जो..
आज चौखट पर खनकता झंकार हैं उनका...!!!


बस यही जिद्द चिपक कर बैठ गयी सांझ,
कि झील में उतरा हुआ ये चाँद है उनका...!!!


हर ज़र्रे में फिसलती हैं प्यास रूह की,
बस आये तो सही कुवां पास हैं उनका...!!! 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

शब के मोती..!!!


हर रात के बाद एक उजाला मांगती जिंदगी में जाने कितने ऐसे क्यूँ आ जाते जिनका जवाब शायद इस कायनात में नहीं मिल पाता...मरहम तो मरहम दर्द भी चलते रहते उनके ना होने पर लोग उन्हें भी खोजते...और कुछ दर्द की परिकाष्ठा का माप तो छितिज तक ही मिलता...जो न कभी धरा पर मिला हैं और न ही कभी मिलेगा...!!!
शब रोती रह गयी पर कोई मनाने न आया,
चाँद टंगा फलक पर कोहनी बल चला आया...!!!


झील तो सो रहा था साँसे रोक कर ऐसे,
किसी का टपका आंसू उसे जगा आया...!!!


साहिलों पर अक्सर औंहाते सींप दिखे,
उन्होंने भी उसको कुछ बहला फुसलाया...!!!


अब तो आ गया सूरज टीले पर चढ़ने,
लगता उसी ने हमारी शब हैं भगाया...!!!
 

शनिवार, 15 सितंबर 2012

पता पूछती जिदगी..!!!

जिंदगी मजिल का पता पूछते बीत गयी...!!!
हर सुबह रोज निकलती घर से ओढ ढांप के,
चौराहे पहुचते किसी पनवडिये को देख गयी...!!!
चार तनहाइयों बाद एक हलकी सी तबस्सुम,
ऐसी ही आवाज मेरे कान को खुजला गयी...!!!
हमने भी देख लिया खांचो में बसे अपने दर्द को,
और एक बयार पुर्जा थामे आसियाने पंहुचा गयी...!!!
इस बीच क्या हुआ किसको बतालाये आलम,
जल्दी-जल्दी में बिना चाय पीये निकल गयी...!!!

लौटकर हमने मेज पर देखा तो पाया,
जाते जाते वो अपनी यादें ही भूल गयी...!!!
हिम्मत नहीं कि उड़ेल दे पिटारे उसके,
यूँ साँसे चौपते ही उसे बक्से में रख गयी...!!!

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

जिंदगी की चाय..!!!


सुबह उठाते ही एक आस के साथ पहुच जाते लोग चाय के मैखानो में...जैसे कितना नशा होता उसमे और बहकते हुए खोजते छप्पर जिसके तले कंडे पर उबलती हुई चाचा की चाय...साथ में वो पड़े रगीन अखबार आकर्षित करते सबको झपटने पर...!!!
बड़ी अकेले सी जिंदगी चाय पीने निकली...
एक फटे पुराने छप्पर में रुककर वो...!!

अपने पुराने अल्फाजो को प्याले में डुबोकर,
कैसे उसे आराम से निगल रही...!!!

उसपे भी रो रहे चाचा की छत,
को ताक कर कुछ उसे इशारा करती...!!!

केतली से निकलती इलायची की अश्क,
उसे पकड़ कर जाने कहा सोच रही...!!!

गरमागरम चुस्की लेने को बेताब,
होंठो से दर्द फूँक फुंककर मिला रही..!!!

बुधवार, 12 सितंबर 2012

क्यूँ न तू...!!

कभी था पर कभी उसे ना पता हैं,
छोटी छोटी बातों में क्यूँ मद खपाता हैं...!!
एक सांझ रोज आती घूँघट काढ़े,
क्यूँ ना तू उसे अपने लिए मनाता हैं..!!!
देख रोज चाँद भटक आता यहाँ पर,
क्यूँ ना तू उस रौशनी में नहाता हैं...!!!
जिंदगी तो ठहरी मजदूर जन्नुम की,
क्यूँ ना तू कटोरे में रोटी प्याज सजाता हैं...!!
बूढी इमली पीछे दुधिया टोर्च थामे रखता,
दिन ठीक हैं वरना यह चाँद भी लडखडाता हैं...!!!

यादों के बस्ते...!!!

कभी प्यार इतनी थी उनसे,
कि यादें पड़ी हैं बस्ते में...!!!
हर ज़िक्र करते थे उनसे हम,
पर अब मिलती न रस्ते में..
बासी भले हो गयी यादें देख पर,

रंगत न उतरी इस गुलदस्ते में...!!!
क्या पहनाए आँखों को कटोरे,
देख अब आंशु बिके हैं सस्ते में ...!!!

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

पुरानी एल्बम...!!!


बस लिए बैठा फटी पुरानी तस्वीरे...!!!
कुछ अन्सुझी सी एक उदासी लिए
लपेट रहा उसको धूल लभेडे अलबम में..!!
कुछ लम्हे काट कर जेहन में पिन कर लिए...!!!
पर कुछ को छोड दिया वही...पकड़ न सका...!!!
कई को देख आखों को लगा
कोई प्याज काट रहा बगल..!!!
कुछ चिंगारी उठी...धुवां सा हुआ...!!!
अब जलते शहर में क्या करे कोई शायर...!!!
 

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

आयतें फूकते रहे...


खुद को साजाएं देके उसे ढूढते रहे .. !!

यादें हो किसी अधजली लकड़ी जैसे ..
बार बार उसमे आयतें फूकते रहे .. !!

हर एक निकलते धुएं को पकड़ ...
हम भी बस उसी की "आकृति" गुथते रहे .. !!

एक आग सहारे बैठे उन बर्फीले गुफाओं में ..
खून के सफ़ेद होने का इन्तेजार करते रहे ..!!

इन बर्फो पर जमा किया रंगीन गुल फिर भी ..
बांज की कोख जितनी ही उम्मीद पालते रहे .. !!

सोमवार, 3 सितंबर 2012

आकृति...


किसी अनजाने जगह को मैं तडपता हूँ..
अरसो से सोया हूँ फिर भी मैं बहकता हूँ...!!!

एक आग की चिगारी बदन में उतारने को,
सूखे रेतों में कितने पत्थरों को रगड़ता हूँ...!!!

एक बरस गुस्साई इस सांझ को मनाने को..
झील में उतरी चांदनी पकड़ने मचलता हूँ...!!!

बड़ी कशिश थामे उस फलक को देखते...
उनमे अपनी "आकृति" लिए बलखता हूँ...!!!

सुबह जल्दी आ जाती रात भगाने को...
तमाम सूरजों को जेबों में लिए टहलता हूँ...!!!

इतने अनबुझे राख थामे यादों के थैलों में...
जाने किस चमत्कारी भभूत खातिर तरसता हूँ..!!!

रविवार, 2 सितंबर 2012

कभी कभी पूछते लोग...!!!

कभी कभी पूछ बैठते लोग कहाँ से उतार लेते खीचकर अपने भीगे अल्फाज हम...!!!
एक साथ कभी बैठती सुबह...जिसके कंधे पर छोटे बच्चे की तरह लदी बयार...!!!
पहुच जाती मेरे बालों के गांठो को खोलने...!!!
उसपर यह मंद मंद मुस्काता सूरज थोड़ी ही देर में उबल जाता जैसे फफक पड़ता ढूध से भरा भगौना..!!!

कुछ अब्र उसके आस पास घुमते मानो आँख मिचौली खेल रहे हो...!!!
इतनी सब के नीचे कैसे रखे कार्बन जो उभार दे सारी सिसकियों के पीछे छुपे बैठे वो जख्म...!!!
जाने इतना कुछ किस श्याही में उभरे अब उन्हें कौन बताए...!!!
कभी कभी पूछते लोग...!!!

शनिवार, 1 सितंबर 2012

खामोशियाँ.....

ख्वामोसियाँ जैसे उधेड़ गयी सारी रेशम से लिपटी ख़्वाबों की तस्तारियां ... !!!
शायद मेरी सलाई भी मुकद्दर चुरा ले गया ताकि दुबारा सिल ना सकू... !!!
अपनी यादों के उन लकीरों को... !!!
किस्मत तो शायद गर्दिसों की बालकनी में मजे ले रही हैं... !!!
और दूर सुनसान एक अकेली साहिल के करीब करीब बैठा मैं ... !!!

एक ठूठे पेड़ जैसे उम्र और झंझावातों की मटीयाई सी चादर ओढ़े इन्तेजार कर रहा उस सावन का ... !!!

बरसात...

उन बरसात के पानी में कितना अपनापन हैं...
हलकी सी बारिश में भी घुटनों तक चले आते बदन को छूने...
लड़ते गुजरते घरों मकानों के दीवारों से टकराते हुए...
पनाह देते खेल कर जीते हुए उन लडको को...
जो अपने आनंद को दर्शाने खातिर उतर जाते उनके गोद में...!!!

धुंध से धुंधला...


धुंध आँख से ओझल हो चूका हैं,
फूल डाल से टूट चूका हैं,
खो गया सब कुछ यहाँ भी,
दिशायें पहचान सब लुट चूका हैं..!!!
तलवार छुटी... अश्व घायाल,
देख ये क्या से क्या हो चूका हैं...!!!
कौन दुश्मन और कौन दोस्त,
सब धुंध से धुधला हो चूका हैं..!!!
सुना हैं भींड में जैकार सुनाई नहीं देती,
तभी इन मातमो को झीगुरो से सजा रखा हैं ...!!!
बस टूटा पहिया ही साथ रहे मेरे,
इन्ही के सहारे चक्रव्यूह को भी भेदा जा सकता हैं…!!!
 

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कुछ कर जाएंगे...!!!


निकल पड़े हैं इन सुनसान रास्तो पर,
कोई बचा लो वर्ना हम भटक जाएंगे...!!!
इनती दर्द भरी रहती यूँ जीने में,
बेवक्त वो गुलाबी कटोरे छलक जाएंगे...!!!,
यूँ परिंदे भी हो जैसे खेतो के मजदूर,
शाम होते ही अपने कोटर को लौट जाएंगे...!!!
जिंदगी के रास्तों में तमाम गड्ढे हैं,
ज़रा गाडी आहिस्ते चलाओ नहीं तो पलट जाएंगे...!!!
इस कहानी को पानी में लिखने से क्या फायदा,
सारी बातें तो लहरें ही चुरा ले जाएंगे...!!!
दिन में परियो की काहानिया मत सुना ए राहुल,
जाना दूर हैं मुसाफिर रास्ता भटक जाएंगे...!!!
(हामारी डायरी का एक अंश)
 

चला जाता था...!!!

तेरा हाथ मेरे कंधे पर यूँ पड़ जाता था,
बड़ी खामोसी से दुःख का मौसम गुज़र जाता था,
खुद का दिल तो ऐसा परिंदा था जिसके पर टूटे थे,
उड़ता रहता बादलो में और पठारों से टकरा जाता था..!!!
यूँ रात भर हम भीगे थे इन यादों की बारिशों में,
दिन भर काँटों के तारों पर फैलाकर सुखाया जाता था...!!!
गया था मैं दुनिया की बाज़ार में खरीदने,
हमको क्या पता था की किससे किसको ख़रीदा जाता था...राहुल...!!!
(हमारी डायरी का एक अंश)

किसे दोष दूँ????

बड़ी शांति से बैठा था मैं एक शाम को जैसे आँख लगी पर ख्वाब ही चोरी हो गया...जाने किसने चुराया...पर धुंध की बदली में छुपा सूरज मुस्काने लगा...एक पीपल की ओट लिए चाँद भी चिडाने लगा...अब किसे किसे दोष दूँ कोई बताए जरा...दिल को मतवाला था कभी अब तो वो भी झुझ्लाने लगा...

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

टूटते तारे...

टूटते तारों में वो नजाकत नहीं होती,
जितना लोग उनके जेबों से टटोलते रहते..!!!
वो तो मुख़्तसर ही समय गुजार लिया,
पर लोग झूठ में ही उन्हें पुकारते रहते..!!!

हवा का दुप्पटा...

यह पत्थर लिपटे धरा से रो क्यूँ रहा ...
मुझे पता था वही उसका प्यार होगा...!!!
एक खत पागल हवा की दुप्पटे पर....
कभी लिखा रखा था तुमने याद होगा...!!!
बड़ी इन्तेजार करके सो गया तेरी चौखट पे...
हो ना हो वो ही तेरा यार होगा...!!

पैदल चल रहे हो तो किसी को साथ ले लेना...

पैदल चल रहे हो तो किसी को साथ ले लेना ,
टूटे परों लदे रास्तों में अपनी साख बचा लेना...!!!
एक गजल खातिर मुह फुलाई बैठी रुत देख,
कभी उसकी तो कभी अपनी सुध बुला लेना ...!!!
एक सकरी गली तलक पहुच चुकी जिंदगी,
हो सके तो अब तो तुम तिराहे बदल लेना... !!!
आजाद परिंदे छुपे बैठे हैं उस पहाड पीछे,
मौका मिले तो उनसे भी जाके मिल लेना...!!!

दराज में अंशु...

एक अर्शे से रखी थी दराज के कोने में ....वो आयातों की किताब ..!!
आखिर क्या जफा हुई पकड़ न सका ...वो आयातों का शैलाब ..!!
इन मुकद्दरों ने भी जाने कितने खीरोचे दी ए दोस्त,
ज़ेहन में लगे महीन धागों को लहू बना गया वो ख्वाब ..
देख कैसे पालथीमार के बैठे हैं हरशु ग़मों के अब्र ,
जाने कितनी बरसातों बाद निकल पाएँगे इन चेहरों के भीगे नकाब ..!!

उमस भरी रात ...

इन उमस भरी रातों का क्या कहना ...बजाते रहते पुराने बॉस के बने पंखे ...दूर जलती लाल रौशनी तलक आँखें रुक जाती ...एक ठंडी आँचल लपेटे बयार को तरसते ...साथ निहारा करते गुमशुम खोये चाँद को ...तारो के सेज में लिपटा कैसा बदली में चुप रहा ...

निगाहें खोयी रहती...

जिस्म बसता यहाँ...यादें कहा खोयी रहती...
हर फुर्सत के पलो में...निगाहें यही खोजती रहती ...
उन छुपती सर्गोसियों तले देख...
तस्सवुरों में यूँही उलझाया करती...

एक एहसास..

जाने उस रात के आने तलक क्या होगा..काश उसके आने से पहले ही मर जाए ये दिन...दूर साहिल पर पड़ी तड़पती सीन्पों जैसे...वरना वो रात की ख्वामोशी मुख़्तसर ही...आ के मेरे जख्मो को कुरेदेगी ज़रूर.....

बदल गए


खून तो एक ही था पर खंजर बदल गए,
जाने कितनो को ले डूबे वो मंजर बदल गए ...!!!

हमारे बगियारे में भी खिलते थे गुलाब,
पर अब वो मिट्टी साख के जंगल बदल गए...!!!

मोतिया भी गिनते रहते थे कभी हम भी बैठे,
पर क्या करे शायद मेरे वो समुन्दर बदल गए...!!!

सूनी वादियों तलक खोजते झिगुरो को हरसू,
पर शायद उनके ठिकाने सारे बंजर बदल गए... !!!

कुछ अनछुए पहलु...!!!


एक याद तस्वीरों से लिपटी हैं...कोई पढ़ सके थो पढ़ ले...वरना मौला भी दुखों के पैमाने...सबके अलग ही अलग बनाता..दूसरा कोई किसी और के जाम नहीं निगल सकता ..."

हमने भी रख ली हैं अपनी पलकों
पर तेरी भीगे हुई ग़मगीन आँखें...!!!

जैसे गिरजे में छाई खामोसी,
और रहलो पर बैठी महीन बाहें... !!!

एक आंसू गिरा दो दृगों से दर्जे पर,
कौन पहचाने किसकी नमकीन आहें...!!!

कैसे पुकारेगा पत्थर से लिपटा वो,
जिनकी यादों से भी संगीन थी बातें....!!!"

आग पर यादें...

गुलामी हैं या आजादी पता ही न चलता,
गैस के चम्बर बिना ही शरीर फुकता रहता...!!!
इन् स्टील की जंजीरों को क्या बनाना,
अपराध बिना भी जीवन ताउम्र जलता रहता...!!!
यूँ उठा कर रख दी हैं हीरोशीमा पर यादें,
पर जेहन का क्या हैं जो खुद उनसे डरता रहता....!!!

सपेरा


प्यार किससे करे...
अब कोई आँखों को जंचता नहीं...!!!
दिल छुपाते कहीं...
पर यादों से वो भी बचता नहीं...!!!

जाने कितनी दूर तलक...
चले आये हम सदमा झेलते...!!!
कांच से कंकड़ बने हम...
अब कोई फर्क पड़ता नहीं..!!!

बिन बादल गिरे ही...
हम झुलस गए देख...!!!
यूँ कोई आँचल तले..
बिजलियाँ तो रखता नहीं...!!!

कैसी अजब सी खामोसी...
रहती शब् की फिजाओं में...!!!
शायद हवा भी उनके...
बातो में अब बहकता नहीं...!!!

उस सर्प-जोड़ो का जाने...
क्या हुआ कौन पूछे...!!!
अब्ब थो सपेरा भी..
अपना पिटारा खोलता नहीं..!!!

बिन चिरागों में बैठी अमावसी रात...

बिन चिरागों में बैठी अमावसी रात जैसी,
दुनिया भी एक दुल्हन हैं सताई हुई...
एक जेठ की तपतपाती धुप जैसी,
मेरे मजार परके फूल सी मुरझाई हुई...
उन किरणों की तबस्सुम को लपेटे,
हंसी होंठों पे लाके दबाई हुई...
हर मुखरो को ये किताबी झलकती ,
कितना किताब्खानो तलक ये भरमाई हुई...

कब्र से आवाज़

पलटकर 
वापस न 
लौट आये साँसे देख,
दो गज 
जमीन भी 
रोज भीगाने आता कोई...!!!
अब्रों से 
कहो जरा 
रोक दे अबसार अपनी,
भीगते कब्रों 
को दामन से 
सुखाने आता कोई...!!

हम तो 
इसी खुशबू से 
दिल लगा बैठे थे,
दिन बदलते ही 
यह मिटटी भी 
बदलवा जाता कोई...!!

मुक्कदर....



साजिशों  को  दामन  से  लगाकर  देखो,
उस  सुनी  बस्तियों  में  नगमे  गाकर  देखो,
पलटने  लगेंगे  दस्तूर  मुक्कद्दर  के,
बस  हाथो  को  भट्ठी  में  तपाकर  देखो...!!!
एक  उमस  भरी  दुपहरी  पालती  ये  ज़िन्दगी,
हर  रोज  ख्वाबों  के  पानी  से  नहाकर  देखो..!!!
इतने  दूर  भी  ना  होते  सितारे  ए  दोस्त,
बस  एक  बार  तुम  बाहें  उचकर  देखो...!!!
गर्दिशे  तो  पालथी  मारकर  बैठी  रहेंगी,
बस  कभी  उनकी  खातिरदारी  में  यूँ  उतरकर  देखो...!!!

जलता शहर...

देख उस जलते शहर किस तरह में बैठा था मैं,
गजलों को पुडिया बनाकर बाहर फेका रहा था मैं...!!!
उन गिरते लफ्जों को इस कदर संजो लिया,
मानो उड़ते धुएं तलक उसने चेहरा ढाप रहा था मैं...!!!
कितने आईने बदन पर डाले बैठा था मैं देख मौला,
फिर भी खुद की सक्ल समझने में नाकाम हो रहा था मैं...!!!

एक तस्सवुर:

जाने कितनी कंघी थामे हवाएं...सहला जाती बालों को...मानो कितनी नजदीकियां हो उनको हमारे रूह में आने की..इतना ऊँचा ऊँचा बोलते दो लड़ते झरने जैसे कोई देहाती दोस्त बड़े दिनों बाद मिले हो..एक दरिया भी शिथिल रहता एक तलक वरना वो भी आँख पर पट्टी बांधे...शामत आई शामत आई खेलता...बड़ी धुल से धुली अंधड़ भी गाँव में आँखों पर चश्मे टाँगे लोगो को परेशान करती...राहुल...

आँखों के मोती....

कहाँ तलक देखू उसे मैं बता ए मौला,
सुना हैं वहाँ दिन में ही रात होता हैं...!!!
बस कोई यह बता दे उन बहती आँखों से,
मोतियाँ बिखेरने से भी चेहरा ख़राब होता हैं...!!!
बड़ी रातों में बेहोश पड़ा रहा मैं भी,
अब उन सपनो में कहाँ नया लिवास होता हैं...!!!

जलते सम्मे


जलते थे सम्मे अब थो घर भी जलने लगे हैं..!!!
जेठ की उमस भरी दुपहरी से मुह पकने लगे हैं...!!!
दिन में कहा खो जाती झिलमिलाती झींगुरों की आवाजे,
अब थो उनके बिना ही लोग देख कैसे,
तनहाइयों तलक भी खामोसी तलाशने लगे हैं...!!!

ये अच्चा हैं देख...

ये अच्चा हैं देख...
कि कुछ लोगो के ख्वाब पूरे नहीं होते,
वरना आज बुतखानो में पत्थरों की जगह,
ताज जैसे कब्रें ही खामोशी समेटे होते.

मुकद्दर....

वो मुकद्दर को गर्दिशों में इतना घुमाया,
यूँ जाना था जन्नत लो जहन्नुम ले आया...!!!
अब्ब किस किस से गिला करे ए मौला,
जब कासिद ने ही पैगाम उल्टा सुनाया...!!!

Mother's Day Special...

"13 May":
जाने कितने गुनाहों की सजा साथ चलती हैं,
पर अब तनहा न रहते दुवाए साथ रहती हैं,
उन कश्तियों के पलटने पर सदमा ना होता,
समुन्दर की लहरें आँचल बिछाये बहती हैं...

गिरते वक़्त भी जख्मों को सहेज लेते ए दोस्त,
इसी बहाने ही उनके हाथों की लकीरे..
मुक्कदर में जन्नत के सितारे उड़ेलती जाती हैं...
कितनी गर्दिसों में पनपते उनके सितारे ए मौला,
जिनके ताजों में माँ की आयतें ना चमकती हैं...

दर्द...

कितने दर्द उसने चुनचुन कर मेरे झोली में डाले,
सूखती राख भी भरभर कर भी मेरे आँखों पे मारे..!!!
यूँ आग थामकर हमने दाँतों से छीला हैं रूह को,
अब भी जाने कितने बचे हैं देख ए दोस्त,
उसी दर्द की आगोश में पनपते 
बिन पैमानों के मैखाने...!!!

आकृति...

जाने कितने बरसो से दिल इसी उम्मीद में खड़ा...!!!
ए हवा आज तू उन सम्मो को भी अब्ब बुझा दे
जाने कितने आते जाते चेहरों में तुम्हे ही खोजता रहा...!!!

एहसास...

यूँ बैठा था अकेला यमुना के झूठे साहिलों में,
की एक सुधि भीगी हवा ने गुपचुप बताया की,
कोई था यूँ लेटा उन ताज के टूटे मकबरों में....!!!

खामोसियाँ...

जाने कितने कयानातो में भटकता रहा था मैं..!!
धुएं से लिपटे उस कालिख जैसे,
इस शब् के दायरों से चिपकता रहा था मैं...!!!
वक़्त के बांह से कटकर जो गिरा बदनसीब लम्हा,
बस उसी को थामे देख कैसे बिलखता रहा था मैं...!!!

बड़ी ताजस्सुम बाद पंहुचा उन गलियों में,
तो उसमे भी उसके घर का निशान ढूढ रहा था मैं ..!!!
अब रोक लो जाके चीखती उन खामोशियों को,
बस आखों पर कान रखे ए राहुल,
बस इस पहर से उस पहर को ही ढूंढ़ता रहा था मैं...!!!

नामुराद गलियाँ

कोई रोक लो हमें ज़रा यूँ ,
चल पड़े फिर उन नामुराद गलियों में,
अब्ब देखते हैं क्या होता हैं ए दोस्त,
दिल पकडे हैं अपने सीने में पर,
शायद उलझा आये हैं उनकी बालियों में...
अब्ब कौन समझाए इस मासूम को,
हम थो सल्तनत तक लुटा आये हैं,
उनकी झूठी बातों से लिपटी वादियों में ...

यादें

जिंदगी कभी ऐसी गूँज भी सुनाती हैं,
बशर को शायरों के चौबारे पहुचती हैं,
मोती लादे नयनो में कोई झाके तो सही,
कितने किस्से की झलकियाँ दिखलाती हैं...

कभी बुलाती वो पीले पत्र ओढ़े हुए,
तो कभी जेबों से सूखे नज्म खुलवाती हैं...
रात कुरेदता पुराने जख्मो को लिए ऐसे,
की बासी यादों के बने पुलाव सनवाती हैं...
देखते उड़कर कटे लुढ़कते उन पतंगों को,
ज़िन्दगी भी जाने कितने मंझे कटवाती हैं..

यादों की पिटारी ..

प्यार किस्से करे अब्ब कोई आँखों को जंचता नहीं,
दिल छुपाते कहीं पर यादों से बचता नहीं,
जाने कितनी दूर आये हम सदमा झेलते,
कांच से कंकड़ बने हम अब फर्क पड़ता नहीं..
बिन गिरे बदल ही हम झुलस गए देख,
यूँ कोई आँचल तले बिजलियाँ थो रखता नहीं...

कैसी अजब सी खामोसी रहती शब् की फिजाओं में,
शायद हवा भी उनके बातो में अब बहकता नहीं...
उस सर्प-जोड़ो का जाने क्या हुवा कौन पूछे,
अब्ब थो सपेरा भी अपना पिटारा खोलता नहीं..

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

नींद के पैमाने...

धुप की सर्गोसियों को सुनती,
ये शाम भी दुबकी चली जाती हैं...
बातें जाने कितने हैं उसके जेहन में,
फिरभी एक लफ्ज न डुलाती हैं...
धुंधले पड़े एक चिराग के इर्द गिर्द घूमती,
चुप चुपके अपने नयनो को सुखाती हैं...
अब उन यतीमों की चीखों को कौन सुने,
सुना हैं की रात तो मौला को भी,
नींद के पैमाने चढ़वाती हैं....

अश्कों की बातें...

अश्कों की बातें दिल भी नाजाने,
सब्र की पुल पर खड़े हैं देख,
ना जाने कितने तराने....
कुछ बिखरे यादें हैं तो कुछ टूटे पैमाने...
इतनी खामोसिया रहती सुनी रातों में,
एकाएक कहा चल जाते झिगुरों के तराने,
खैर ज़िन्दगी भी हैं ऐसी की,
लिए चलते हैं उनको भी घुमाने फिराने....

चींटी कि व्यथा...

आती आती वो दौड़े दौड़े,
लेकर के पकडे कुछ भौरे,
उसकी आजादी छीन जाने की,
उसकी व्यथा बतलाने की..
जब जब यूँ कोशिश करता हूँ,
तब तब यूँही कुछ खोता हूँ,

फूलो से चिपके रहते वो,
फूलो के साथ ही चलते वो,
दुनिया वाले ये क्या जाने,
उनकी खातिर सब खोते वो..
दिन होती या निशा चद्ती,
गुलो के गुलाबो में सोते वो,
रश खीच खीच ले जाते वो,
लोगो को मिठास दिलाते वो..
पर लोग भी तो क्या जाने,
शोहरत खातिर मरना जाने..
भौरे थो एक बहाना हैं,
साथ मुक्कदर ही लिए जाना हैं..
कौन आता पकडे ज्ञान ध्यान,
सब यही छोरकर जाना हैं,
रह जाएंगे वो अटूट सत्य,
बस वही लिए दफजाना हैं..

नजरें चुराने लगे...

हमसे वो मिले भी तो नजरे चुराने लगे,
जाने क्या कहा था उस दिन उनको हमने,
यूँ सीन्पों से निकलकर मोती झाकने लगे,
एक अजब सी तस्सवुर थी जेहन में पली,
दिन ठहरे पर फलक पर तारे टांगने लगे,
क्यूँ रोकू मैं खुद को जाने से बता दे ए मौला,

जब कशिश के तार हमें उस तरफ बुलाने लगे,
कितनी तड़प हैं मिलने की पूछ दिनेश से,
वो क्यूँ आखिर किरणों की ओट तलक आने लगे..

जुगनू बेगैरत हो गए....

शाम को बुलाया था उन्हें,
अब वो जाने कहा चले गए,
वो तो न ही आये पर देख,

अपने यादों के तराने भूल गए,
दिन होते थे जब वो बाते होती थी,
यादों तले कुछ फरियादे भी होती थी...!!!
अब थो जुगनुओं भी यूँ बेगैरत हो चले हैं,
जैसे अंधेरो की आस्तीन में खुद को सी दिए हो..!!!
चाँद भी मधिम...रात भी काली,
तारों की हो गयी हो जैसे बदहाली...!!!
अब जज्बातों की सिद्दत में कैसे रुके माली,
जब टूट रही हो उसके फूल की वो नाजुक डाली...!!!

फिर भी...रुकते हम
देखते हम...चलते हम...!!!
जाने कितनी और दूर हैं वो बहाना,
जिसे हर वक़्त के....हर अफसाने में,
आंशुओ के धागे से पिरोते हम...!!!

बयार...

बयार बदलती पर ये दिन तो बदलते नहीं हैं,
मुरझाये गुल अब तकियों तले जांचते नहीं हैं...!!!
कबसे बैठा ढूढ़ रहा मैं उस पीपल तले,
साए पर साए देखो अब बसते नहीं हैं...!!!
एक छुवन थी ग़मों की धूप सी छतरी ताने,
ये फौलादी बर्फ के शीले यूँ पिघलते नहीं हैं...!!!

वफ़ा,रंगत,चाहत,अरमान सब हैं दमन पर,
रंग लगे उस गुलाब से अब छूटते नहीं हैं...!!!
हम तो ऐसे बदहवास से हो चले हैं,
कारवां भी ग़मों के काफिले से रूठते नहीं हैं...!!!

23 मार्च...भगत सिंह स्पेशल...

"कमीज में खून छुपाने की ये रीत पुरानी हैं,
दर्द से काँप उठे लफ्ज ए दोस्त,
आज उनकी समताओ का वर्णन करना,
शायद ये उनकी सरफरोसी से बेमानी हैं,
दिलेरी तो ऐसी हैं जैसे भीड़ जाए सिंह से,
पर गिर गए फूल बिन देखे ढेरो बसंत ए दोस्त,

यह उसी यौवन में लिखी कभी की गीत पुरानी हैं.."
कुछ टूटी फूटी पंक्तियाँ थी हमारे जेहन में हमने उसे लयबद्ध किया हैं...

A Striker Salute to our Bhagat Singh,Rajguru,Sukhdev..
Let have throw a simple glimpse on those pages printed red mark with these..Braves..
Jai Hind..

जिंदगी:एक भंवर....लेख...

कभी कभी हम अपने अनुभवों के संसार में केवल एक अकेले नाविक भाति हवाओं से लड़ते रहते हैं...उस भ्रम रुपी संसार के क्रिया कलापों के रचनाकार हम स्वंय ही होते हैं...हम लाख मन्नते कर ले किसी अन्य को अपने उस संसार की ऊष्मा में जलाने में पर हम उन्हें
 उससे परिचित नहीं करा सकते....उसके दुःख, पीड़ा, ख़ुशी, भावनाएं केवल अपने दायरे तक ही नियत रहती हैं ...हमारे अपने लिए होती हैं वो अजब दुनिया... दूसरों के लिए वह एक विचित्र अलग संसार जैसा हैं...वह उसके बारे में जान सकता है, पढ़ सकता है, सुन सकता है... परन्तु उसे महसूस कटाई नहीं कर सकता. ठीक ये बात उसी तरह होती जैसे हम छोटे थे ... हमारे बाबूजी बताते थे की हम लाखो मंदाकिनियों में विलीन हैं और उनमे से सिर्फ एक मन्दाकिनी में हम रहते .... और सूरज चाँद धरती आकाश आग पानी...सब सब इस परिवेश तलक ही हैं..दूसरी दुनिया में कुछ भी नहीं ...सिर्फ धुंध से धुधली तस्वीरे हैं ...जो दिखती नहीं इन् नाजुक आँखों से..

भीगे पन्ने...

पलटकर न देखता अपने किसी शेर को,
हर नज्म पुराने अंशु टपका जाता,
पन्ने भी तो भीग जाते उन्ही अब्सारों से,
हर रोज जाने कौन उन्हें फैला जाता....

जय बजरंग बली

दोनों करो से प्रणाम कर,
वहीँ माथा टेके,
कस्ट कटे,विघ्न हटे,
बजरंगी दुलार लेते..!!
पाप कटे,दोष छानते,
मन हो श्रद्धा परिपूर्ण ,
लो खड़े यमराज समक्ष,
करते हैं जी हजूर..!!
काल स्वयं ही प्रकट,

गाते महिमा का बखान
तीनो लोको के स्वामी को,
मेरा छोटा सा गुणगान ...!!

शिवरात्री स्पेशल

काल चक्र के कष्ट को...वो रख लिया तुरंन्त...!
अमृत से पहले निकला विष...उसे चढ़ा लिया तुरंन्त...!!
देव हो या निशाचर...रखते वचन तुम अत्यंत...!!

महाकाल की महिमा आगे...करू क्या मैं अभिव्यक्त...!
एक बूँद जैसा हूँ मैं...

करू कैसे वो सागर सशक्त...!!
ये पर्व हो या कोई पहर...बिन उनके होते न विरक्त...!!

एक अजीब सी उलझन है...इन कोलाहल में..!
कभी होती कभी न होती...यूँ आजकल में...!!

गम-ए-जनम दिवस छोड़कर भी...कभी बुला सुहैल को ...!
ए महादेव मत आना तू भी...और उगल दे तू उस विष को...!!
जिसने बढ़ा रखा हैं...तेरे नाजुक कंठ की तपिश को...!!

हा आज तू निकल दे...सारे कष्ट जो हमने दिए तुझे,
ये लोग हैं थोड़े भुलक्कड़,या हैं शायद गुम्मकड़..!
जाते तुझे कराने स्नान,
और भूल जाते तेरे...ताकतों का आयाम
तभी रह जाते हैं यह ताउम्र भुख्खड...!!

<<<भोले नाथ आपको समर्पित >>>

वैलेंटाइन डे...स्पेशल...

"माएने बदल गए हैं प्यार करने के आजकल के परिपेक्ष में"...
"प्यार तो हर पल का एक एहसास है,
मानो तो एक अटूट सा विश्वास है
दिल तो सबके पास धडकते हैं,
पर उनको किसीकी जेहन में
धडकना जरा अलग सी रास हैं"...
वक़्त बदला,सोच बदली..!!!
प्यार करने की,तहजीब बदली...!!!
कल्पना छुटी,मासूमियत रूठी,
देख पत्थरों से लड़कर,
ये यादें भी तो टूटी...!!!
यहाँ हीर की खातिर,कभी लैला रोती,
तो कभी रोमीओ की यादों में,
ये जुलिअट कुछ खोती...!!!
एहसास की बात,

वरना यह हवा न होती,
दिन बदलते ही देख,
यूँ जोड़े ना बदली जाती...!!!
जिस बातों को बताने,
में जुबान काप जाती,
धडकनों को छुपाने,
में जैसे शर्म आ जाती,
उसी की आँखों में,
अपनी यादें बस जाती,
तभी ये जुबान कुछ,
कहे बिना सब कह जाती...!!!
आज सब बातें,
पुरानी सी हो गयी हैं,
दिल वही हैं ये बस,
तराने बदल सी गयी हैं...!!!

बादल:


गुनगुनाता रहा यूँही किसी ने सुन ली,
फिर अजब सी कशिश हवाओं पर ढूला दी...!!

सबने कहा ये मेरा ही दोष हैं,
हमने ही उनपर यादों की किताब सुला दी...!!

कबसे टपका रहा अंशू अब्र आज देख,
पता नहीं किसने उसे अपनी कहानी सुना दी...!!

वादे हमारे और उनके बीच ही थे जब,
फिर इन्हें साथ रखने की किसने फ़ना दी...!!

विशाल:जन्मदिवस स्पेशल...

दिन थमे.....कदम बड़े,
एक आग सी ज़ेहन में छाडे,
तूफान भी आये परों पर,
जब सर पे ये फितूर सी छाडे,
सपने,वादे,चाहत,धागे,
सब रहे यूँही महफूज खड़े....
जनम दिन मुबारक हो विशाल..
Trust Perfection...Remove Fear,
Panik Efforts...Triger Swear...
Four parts takes your van,

To the nearest Dreamware...
Most Lovable Person For Me...
Happy Birthday Lovely Brother....

किताबों के गुल


कभी अपने 
दिन भी हुआ करते थे...
बातों से 

रातें सजोया करते थे...

अब थो 

करवटे बेगैरत हो गयी...

वरना हम भी कभी
किताबों में 

गुल छुपाया करते थे...!!!

बसंत और पतझड़


तेरे रास्तो में बिछे फूल...
अब सूख चुके हैं...!!!

वो बसंत के अरमान...
भी देख रूठ चुके हैं...!!!

आ गयी ऋतू टूटने की...
पतझड़ पंख पसार चुके हैं...!!!

रूठा हैं जुगनू मना ले...
बयार ने सम्मे बुझा रखे हैं...!!!

ठण्ड बहुत पड़ती यहाँ...
तभी सूखे पत्तो बटोर रखे हैं...!!!

सोमवार, 27 अगस्त 2012

झील में नहाता चाँद



दिल भीगा नहीं कि अंगारे बरस गए...
ख्वाब जला नहीं कि खालिश झुलस गए...!!!

बड़ी दर्द थी बादल की ककाराहट में देख...
आंसू भी उसके दामन से सरक गए ...!!!

सूखा गया सब कैसे भी लोग संभल गए,
लूह चली इन वादियों के बौर झुलस गए...!!!

कुछ की छतरी निकली गयी इन आलमों में,
शायाद वे ही बच के कहीं बस गए...!!!

ना रहा उसकी गोद में थोडा भी पानी,
तभी यहाँ लोग कतरा कतरा को तरश गए...!!!

कब से खोज रही धरा तुझे ए चाँद..
पर तुम पहले ही किसी झील तलक उतर गए...!!!

दो शब्द पाठको से:

शब्दों के बीच कागज़ का वो हिस्सा जिस पर शब्दों की वो कालिख अंकित नहीं परन्तु भावनाओ के आवेग में पिरोये गए शब्दों के मोती संगठित होकर चीखने लगे और शब्द कम होने के बाद में आकृति सजीव सामने उभरकर मस्तिष्क पटल पर छाने लगे और ऑंखें स्वयं ही अंश्रु धरा में बहती कवि की उस तस्तरी को भाप जाए जिस पर वो सवार हैं....तब समझ लेना की कविता और कवि का वास्तविक कार्य संपन्न हुआ हैं ....

हमारा वक्तव्य...!!!

भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे....
ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता...
चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धुल की परत...एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धुल की 

हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोडा बेवफा जैसा...एक जाल में था फसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं...
हर बार ज़िन्दगी ले जाती वही कहानी दुहराए:
किसी छप्पर में एक बरसात जैसे मौसम में पीते हुवे चाचा की चाय...कुछ दोस्तों के साथ बैठे बिठाये पल...बादल के हिलते हुए पर्दों से मधिम मधिम छनती हुयी रौशनी आँखों को गर्माहट देती...कुछ चर्चाओं में जीवंत होती अनकहे बातें...एक ट्रेन की आवाज कानो में समाती मानो बगल से गुजर रही हो...सादगी हैं मौसम की...जिंदगी का तजुर्बा देखते...कद बढ़ा...मन बढ़ा...पर दिल रह गया सिर्फ एक मुट्ठी भर का...
जाने क्यों??
आखिर क्यूँ??
बेरुखी हैं इस जन्नत में..जिसे कहते लाखो योनियों के बाद मनुष्य बनता जीव...मोह माया के बंधन में फसता मनुष्य...सच्चाई को जाने परखे बिना ही चलता जाता...जाने किस अदालत की तराजू पर अड़े अहमियत किसी से तौलवाते...