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अपनी खामोशियाँ खोजे

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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

कितने नववर्ष के सूर्य


रेलवे स्टेशनों की
.... धक्का-मुक्की में अड़े....


मोहब्बत की रेवड़ी-पैकेट थामें....
उसकी आँखों में...

जाने कितने नववर्ष के सूर्य
.... ढलते देखा है मैंने....!!!


©खामोशियाँ-२०१३

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

ज़िंदगी का नज़रिया


पल मे ही तो बदल लेती नज़रिया आकने का.....
वरना खूबसूरती की कबतक सागिर्द होगी मोहब्बत .....!!

रोज़ ही तो मिल जाते चेहरे नए "सिकन" ओढ़े....
वरना सादगी की इम्तिहान कबतक पास होगी फितरत....!!!

कुछ सीख ले वक़्त रहते तू भी इस ज़िंदगी से....
वरना ऐसे मे अकेले कबतक बहकी होगी शिद्दत....!!

कुछ लकीरें उधार हो जाते खुद-ब-खुद प्यार के.....
वरना मौत के चौराहे कबतक तड़पी होगी किस्मत....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

रविवार, 22 दिसंबर 2013

एहसासों के "जनरल डायर".



हमे गुस्सा है उन लेखकों से जो अपने एहसासों की लहरें बस डायरी के सफ़ेद पन्नो मे उड़ेल कर अपने मेज़ के कोने मे झटक देते.....!!!

एहसास का भी उसमे पड़े पड़े दम घुटता जाता और वो मर जाते....सिमट जाते किसी कबोर्ड की धूल भरी आलमारी ताकते.....!!!
अगर आपके पास कुछ हैं वो उसे बाहर आने दे.....ब्लॉग को जरिया बनाए....
****************************************************

But Please Don't Strangle your emotions which are with you....Make them to burst a Fountain of Bliss to Bath everyone.....!!!
****************************************************
कल देखा....
एक धूल भरी....
टूटी फूटी आलमारी मे दुबके....
एक पुरानी डायरी मे....
कुछ मरे पड़े थे अलफाज.....!!!


काफी दिन हो गए.....
मिल ना पाया था उनसे....
कुछ बुकमार्क
पकड़ निकाल लिए.....!!!


पर बाकी एहसास
मानो जालियावाला बाग मे फंसे....
एक दूजे के ऊपर....
गिरे पड़े ...!!!


कुछ के सर
दूसरे के हाथो मे लटके मिले.....!!!


कुछ की टाँगो को
अफगानी बम से उड़ा डाले....
आखिर क्यूँ बन जाते हैं आप खुद
अपने एहसासों के "जनरल डायर"....???


©खामोशियाँ-२०१३

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

फ़लक की एक्सरे प्लेट


इस ठंड मे इतनी ओस पड़ रही कि दूर छोड़िए पास ही देख पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा....रेल से लेकर हवाई-जहाज सब मंद पड़ गए है.....और ज़रा सी तेज़ी सीधा हॉस्पिटल पहुंचा दे रही लोगों को....तो बस इसी परिपेक्ष मे हमने कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं ज़रा गौर कीजिएगा.....!!!


एक पूस की अंधेरी गुमनाम रात मे....
चारो तरफ धुंध की सिगरेट फूंकता.....
..................दौड़ा आ रहा था कि.....!!!

वक़्त के पहिये की
दाहिने हड्डी टूटी गयी.....
बूढ़े काका भी ढूढ़िया लालटेन थामे.....
.................जांच रहे मर्ज............!!!

बयार की स्ट्रेचर पर अब भी लेटा......
............कराह से बिलबिला रहा.....!!!

अब देख कैसे कड़कड़ा रहे अब्र.....
फ़लक की चमकती भीगी..........
.....एक्सरे प्लेट पर उभरा है कुछ.....!!!

तारे जब आँसू पोछेंगे.....तो पता चलेगा.....
वक़्त तो.....
..........अभी लेटा बिस्तर पे मुंह लटकाए....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

पैंतरे बदल गए


वादे तो वादे ही ठहरे आजकल के चाहे वो इंसानी हो या खुदा के....टस-से-मस ना होते....अढ़उल हो या अगरबत्ती मानने को तैयार नहीं.....उन्हे भी चाहिए....नए भगवान....नयी मिठाई....सब कुछ चाहिए एडवांसड....अपडेटड....पुराने पैंतरे से अब हल ना होगी समस्या....जितनी जटिल होगी समस्या उतना महंगा हो मेवा.....खैर अब कुछ पंक्तियाँ....!!!

चप्पलें घिस गयीं मंदिर जाते जाते....
आवाज़ें रिस गयीं अज़ान गाते गाते.....!!!

फरियादें ना हो सकी पूरी महीने बीते.....
उम्मीदें रूठ गयी मुकाम आते आते.....!!!

आखिरी तक लगाते गए बाज़ी हम भी....
यादें भी दांव चढ़ी अंजाम आते आते....!!!

पुरानी अक्स लिए तरस गयी ज़िंदगी....
तंग आ गए हमभी अंजान पाते पाते.....!!!

एक के एक बाद लोग छूटते गए ऐसे....
बदरंग हो गए साए वीरान आते आते.....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

एहसास


फीलिंग भी आजकल बिजली के टिमटिमाते बल्ब जैसी हो गयी हैं अभी आती अभी चली जाती है.....हर फीलिंग अब तो शब्दो की खाल बन गयी है.....तेज़ भागते आज के दौर मे ज़रा सी समय की कमी है वरना लोग तो बिन बोले ही कितना ज्यादा समझा जाते....!!!हर एहसास को जरूरी नहीं की किसी भाषा के धागे मे पिरोया जाये....!!!
अक्स धुंधला गया...कसैली साँझ...
...........अचानक आ धमकी....!!!


पता ही न चला कैसे एकाएक.....
फूट पड़े सारे ज़री के गुब्बारे....!!!


और ढाँप लिया पूरे समुंदर को....
मानो परिचित हो.........
.......जनम-जनम से एक दूजे से....!!!


©खामोशियाँ-२०१३

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

काठ के दुर्योधन


पाप-अधर्म.....लोभ-द्वेष.....
अक्सर मिला करते एक साथ....!!!
किसी गुमटी-नुक्कड़ पे....
पान खाते विभीषण से लिपटे.....!!

कासिम-जयचंदो से लदे....
भारत-वर्ष मे....
आज तो
कुरुक्षेत्र बैंचकर आ धमके
कितने चौराहे छेकाए शकुनि.....
पासे फेंके जा रहे.....!!!

कवच टूट चुका....
कुंडल रेपइरिंग-हाउस* मे....!!!
कर्ण पड़ा असहाय.....
नहीं देता वचन
टूटने का भय हैं....!!!

सुदर्शन पड़ा सुन्न....
उंगली घिस गई....
मदसूदन** भी मूक पड़े....!!!

बस कोई रोक लो....
वरना लूट खाएंगे.....
ये काठ के दुर्योधन.....!!!

*Repairing-House.......**श्री कृष्ण

©खामोशियाँ-२०१३  

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

एक बूढ़ी लकड़ी



एक बूढ़ी लकड़ी.....
लिपटे कितने जंजाल.....!!!

आखिर 
कुंडी के कानो मे 
कब तक फंसे रहेंगे.....!!!
जंग की चादर ओढ़े
बदकिस्मती ताले.....!!!

एक ही कमरे मे कैद.....
ना जाने कितने.....
यादों के गुच्छे.....!!!

कुछ तस्वीरें....
.....कुछ लकीरें.....
अनगिनत साँसे......
महफ़ूज आज भी उन्ही.....
दरीचों मे खोयी.....!!!

कबसे कानो का
एक ट्रांसमिटर*
छुपा रखा वहाँ....!!!

अब तो
दीवाल के रंग भी
पपड़ी छोड़ने लगे हैं.....
कौन कहता आएगा कोई.....!!!
*transmitter

©खामोशियाँ-२०१३

शनिवार, 23 नवंबर 2013

नज़्म का नक्शा


किसी दर्द की सिरहाने से....
बड़ी चुपके से निकलती....
अधमने मन से
बढ़कर कलम पकड़ती.....!!!

कुछ पीले पत्र....
पर गोंजे गए शब्द....
कभी उछलकर रद्दी मे जाते....
कभी महफ़िलों मे रंग जमाते....!!

शायद ही कोई होता ....
जो बना पाता किसीके
"नज़्म का नक्शा"....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

बचपन


भीख की आधी कटोरी 
मजबूरी से भरकर.....
ज़िंदगी के ट्राफिक सिग्नल 
लांघता बचपन....
इसी तेज़ी मे जाने कितने 
झूठे नियम तोड़कर.....
खुद को ठगा-ठगा हुआ सा 
मानता बचपन.....!!! 

होटलो के खुरदुरे बर्तन को 
माज़-माज़कर.....
कितनी कड़वाहट खुद को 
समेटता बचपन.....!!!
सुबह से शाम तक 
कबसे पेट दबाये बैठा.....
झूठन से ही अंत मे भूख 
मिटाता बचपन......!!!

थोड़े से दुलार ढेर सारे 
प्यार खातिर कब तक.....
कूड़े की गठरों मे उम्मीदों को 
तलासता बचपन....!!!
सुख की छाँव से 
कोसों दूर तलक बैठकर.....
धूप मे परछाइयों को गले लगा 
बिलखता बचपन.....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मकान बदल जाते



चीख के हर रोज़ अज़ान बदल जाते.....
इंसान ठहरे रहते मकान बदल जाते....!!!

उम्मीद इत्तिला ना करती गुज़रने की...
धूप के साए ओढ़े श्मशान बदल जाते....!!!

दोस्ती-यारी भी अब रखते वो ऐसों से...
एक छत तले कितने मेहमान बदल जाते....!!!

साथ तो आखिर तक ना देता अक्स तेरा....
दिन चढ़ते परछाइयों के 
अरमान बदल जाते....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

रविवार, 10 नवंबर 2013

कितनी बयार


चलते गए मीलो हम पुराने हुए....
गिनते गए पत्थर आज जमाने हुए....!!!

रात भर फूँको से जलाए रखा अलाव...
कितनी बयार आई लोग वीराने हुए.....!!!

सदाये गूँजती रही जी भर अकेले मे....
कल के जुगनू देख आज शयाने हुए.....!!!

ज़िंदगी भी बस कैसी रिफ़्यूजी ठहरी....
भागते-भागते ही गहने पुराने हुए....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

भूल गए


बरसो बाद भी पास बुलाना भूल गए.....
आज के लोग हमे पहचानना भूल गए.....!!!

बड़ी मोहलत दे दी हमने ज़िंदगी को.....
प्यासे समुंदर आँखें मिलाना भूल गए.....!!!

जुगनू ने यारी ऐसी भी क्या निभाई....
परवाने सम्मो से मिलावाना भूल गए......!!!

नज़्म कितनी अभी भी लटकी सीने मे.....
कूँची पड़ी अकेली कैनवास लाना भूल गए.....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

खामोशियाँ


लोग अकसर पूछते कि टैग "खामोशियाँ" ही क्यूँ...
मैं कहता.....

कल्पना का साथ आखिर तक देती है खामोशियाँ....
बिखरे शब्दों को पकड़ के लाती है खामोशियाँ.....!!!
ये मायूस चेहरे कह जाते लाखों लफ्ज चीखकर.....
उन चीखों को धागों में पिरोती है खामोशियाँ....!!!
©खामोशियाँ-२०१३

वादियों के गुलाब मुंह फुलाए बैठे हैं....!!!


कितनों को हम सर चढ़ाये बैठे हैं....
दिल लगता नहीं पर लगाए बैठे हैं.....!!!

रास्ते कहाँ आज गुलदस्ते थामे....
वादियों के गुलाब मुंह फुलाए बैठे हैं....!!!

नजूमी ले गया जायचा भूल से....
चेहरे इन लकीरों मे उलझाए बैठे हैं....!!!

ज़िंदगी कुछ तेरी थी कुछ मेरी भी....
किस्तों के कई मकान बनाए बैठे हैं.....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

सोमवार, 4 नवंबर 2013

सितारे टाँक ले


टूट रही हो आरज़ू तो याद फाँक ले....
फट गई बदली चले सितारे टाँक ले....!!!

आसानी से कहाँ मिलती है मोहब्बत...
राहों के उजाले तले इशारे झाँक ले....!!!

बड़े अधूरे वादे रखे गमों की पोटली मे....
देख रहे लोग चले किनारे ढ़ाँक ले.....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

अकेली दीवाली


देख सूनी पड़ी वादियाँ सूने हैं मुंडेर.....
कहीं रोशनी ठहरती तो कहीं हैं अंधेर.....!!!

दिए तो बराबर ही जलते रहे हरसू.....
रातें पूछती रहती कहाँ बदलते सवेर....!!!

कितनी दीवालियाँ अकेली गुजारी तूने.....
पटाखे भी चीखते दिखे तेरे बगैर.....!!!

कोई क्या कहे कितनी बदल गए यूँ....
हम रहे गए गरीब दुनिया बनी कुबेर.....!!

रो-रो के कितना बदहाल किये हैं बैठे....
आखें रहे तब तो लगे हाथो मे बटेर....!!

©खामोशियाँ-२०१३

ज़िंदगी का पहिया:


पल-पल करते....
दिन भी गुज़रता जाता है....
वक़्त ठहरता कहाँ....
रोज मुंह चिढ़ाता हैं.....!!

इतने सबकी परवरिश....
एक साथ करती ज़िंदगी....!!
कभी तू बुरा मानता....
कभी वो तुझे मनाता हैं....!!

कितनी भी दलीलें दे...
तू रोक न खुद को पाता हैं....!!
हर बार जैसे तू ...
उस ओर खींचा जाता हैं....!!

तू जितना रोता...
उतना ही आँखें छुपाता हैं....!!
पुराने साज सुनके....
फिर दिल को बहलाता हैं...!!

दर्द के दिन भी...
दिये हंस के जलाता हैं....
खास दिन पकड़...
जन्मदिन भी मनाता हैं....!!

ये ज़िंदगी हैं या गमों का मेला....
जो भी आता हैं...
एक रोज़ चला ही जाता हैं....
चला ही जाता हैं....!!

©खामोशियाँ-२०१३

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

SMS बनाम लेटर


खत के जमाने
जाने लगे है....!!!
SMS दिलो पर
छाने लगे हैं....!!!

खोये भी कैसे
पुरानी यादों मे.....!!!
देख आजकल लोग
श्याही से ज्यादा
पैक भरवाने लगे हैं....!!!

पत्र रखे सन्दूक
बड़े अकड़े रहते....
अंदर उसे रखकर
ताले जकड़े रहते....!!

पुराने लिफाफे
लिवास बदलते....
कभी रहते सफ़ेद
कभी पीले पड़ते....!!

किसको फुर्सत भी
इन्हे याद रखने की....
आजकल लोग SMS से
इनबॉक्स भरवाने लगे हैं....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

ज़िंदगी की गीत


कितनी देर लग गयी उसे ये बताने मे.....
गीत बदली नहीं बरस लग गए सुनाने मे.....!!!

इसे मजबूरी बना देना बेमानी सी होगी.....
बड़ी मुश्किल से गजल बनती है जमाने मे.....!!!

दूसरों की बस्तियों मे सम्मे कैसे जलाए.....
जब आग लगी बैठी अपने ही शामियाने मे......!!!

मौके दिये भी गिने चुने इस ज़िंदगानी ने......
हथेली ने धुल डाली लकीरें उसे भुनाने मे......!!!

©खामोशियाँ-२०१३

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

गुमसुम चाँद



चाँद बैठा है गुमसुम रुला न देना
बादल छुपने से पहले बुला न देना....!!!

कितनी रातें जागे दोनों साथ-साथ
बातें करने से पहले सुला न देना.....!!!

सारी यादों की टोकरी अपने सर लादे....
जेहन उतारने से पहले भुला न देना....!!!

आंशू कुछ उसके भी कुछ तेरे भी....
अलग होने से पहले घुला न देना....!!!


©खामोशियाँ 

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

वैबसाइट


होम* से लेकर.....
कांटैक्ट* लिंक तक.....
कितने आवरण ओढ़े.....!!!


चूहे* की एक फटकी*
और खुल जाते असंख्य द्वार....!!!

सोच ही न सके
खो गए मायाजाल मे....
गूगल* से रिश्ते बनाते बनाते....!!!
*home.....*contact......*mouse......*click......*google

©खामोशियाँ

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

बेमानी सी दुनिया....


बेमानी सी दुनिया.....
......पुरानी सी दुनिया

बदल गए सब........
......वीरानी सी दुनिया
आए तो बताए........
......शयानी सी दुनिया

मिलने को बुलाये......
.......सुहानी सी दुनिया
आदाब से सुनाये.......
........कहानी सी दुनिया

किरदार को उलझाए.....
........आसानी सी दुनिया
अजब ही हँसाए..........
.........रूमानी सी दुनिया

बेमानी सी दुनिया.....
......पुरानी सी दुनिया

©खामोशियाँ

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

दोस्ती


एक बच्चा खेलते वक्त सीढ़ियों से गिरा .. उसकी रीढ़ में चोट लगी और उसने बिस्तर पकड़ लिया ! कुछ दिन रिश्तेदार और दोस्त देखने आये फ़िर, धीरे-धीरे सबका आना कम होते-होते बंद हो गया । अकेलापन उसे खाने लगा .... वो बेचैन हो उठा ...तब एक दिन उसकी माँ एक तोता ले आई ...। मिट्ठू .. चोंच बड़ी.. बहुत ही तेज ...चीख कर बोलने वाला छोटा सा मिट्ठू ..! बच्चे ने उसे बोलना सिखाया .. रोज नए शब्द .. रोज नई बातें ! फिर ......धीरे-धीरे वो बच्चा चलने फिरने लगा .. ! फिर दोस्तों में व्यस्त रहने लगा । पढ़ाई और स्कूल ....मिट्ठू को देने के लिए वक्त नहीं था ...अब उसके पास ! मिट्ठू उसको आते-जाते देखता और नाम पुकारता । उसने खाना छोड़ दिया । फिर .. कुछ दिनों के बाद कमजोर हो गया... वो पहले बिल्ली के आते ही बहुत शोर मचाता था .. दो दिन से कुछ बोला नहीं ! सुबह ...लथपथ .. खून से सना पिंजडा मिला !
धमा-चौकड़ी खूब मचाई....
घर-बाहर मे धूम मचाई.....
सीढ़ी ने आदत छुड़वाई
छोटू फिसले ज़मीन लेआई….!!!

चोट थी काफी गहरी लगी....
रीढ़ की हड्डी दुखने लगी....
आते-जाते लोग रहे पर.....
लोग की कमी दिखने लगी....!!!

तनहाई यूँ भारी पड़ी....
छोटू को बात लगने लगी....
माँ से देख अब रहा नहीं.....
बाज़ारी-खिलौने भाया नहीं....!!

काका ने कुछ राय सुझाई....
घर हो मिट्ठू तो क्या हो भाई....
बात कुछ जँचने लगी....
खोज तोते की होने लगी....!!!

पिजरें मे पड़ा घर आया वो.....
छोटू का प्यारा बन गया वो....
लाल-चोंच हरी-खाल बस
राज दुलारा भी बन गया वो.....!!!

दोनों की दोस्ती रंग ले आई....
नए शब्दो की रट लगाई....!!!
अब कहाँ बिलखता छोटू....
मिट्ठू के साथ बहकता छोटू....!!!

दिन-गुजरे वक़्त बदले.....
छोटू मियां चोट से उबरे....
स्कूल-दोस्तों की चक्कर मे....
बस बेचारे मिट्ठू रगड़े....!!

रट-रट के नाम पुकारे.....
छोटू उस्ताद पास ना आए....
मिट्ठू ने भी गाना छोड़ा....
उठना बैठना खाना छोड़ा....!!!

रात की कुछ खटक हुई....
पिंजरे मे कुछ चहक हुई....
खून सना पिजड़ा था अकड़ा....
बिल्ली मौसी ने उसे था जकड़ा....

सुबह उठा और देखा क्या....
पिजड़े है पर तोता क्या....!!!

©खामोशियाँ 

पत्र


कुछ पीले
पत्र आज भी अधूरे रह गए....!!!
लिफाफे ओढ़े
दुबके चुपके बैठे इतमीनान से....!!!


जवाब शायद लापता
डाकिया मिलता ही नहीं आजकल....!!!
कि पूछ लूँ हाल-ए-खबर....

टिकिट भी
पुराने पड़े बड़ी आस से देखते
आँखों पर काजल लगाए....!!!

सोचा करते
कभी उनकी भी तो बारी आ जाए....!!!

ट्रिन-ट्रिन
चलो आ गयी तेरी सौत की घंटी....!!!


©खामोशियाँ 

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

आह्वान करे चलो....


रोष...कलेश....
दुख दर्द हो विशेष....
राग की चिराग मे....
धूमिल पड़े द्वेष...!!!
आह्वान करे चलो....

कथा....व्यथा....
हर ओर की दशा....
अध-मंजिल पे खड़े
आस की दुर्दशा....!!!
आह्वान करे चलो....

स्वार्थ...पुरुषार्थ....
चोट खाते यथार्थ...
नाचती उर्मियों से....
मात खाते धर्मार्थ....!!
आह्वान करे चलो....

वेदना....कुरेदना....
काल-खाल छेदना....
प्यास की प्याली मे
उषा लाली खोदना....!!
आह्वान करे चलो....


© खामोशियाँ

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

धूप का चीलम:


अगर हो सके तो वो आलम बता दो....
जी ना सकते जिसके वो बालम बता दो...!!!


सूरज छुप रहा किसी पहाड़ की ओट मे...
आस की ढेबरी से वो चीलम जला दो....!!!

शरद ऋतु देख आ गई पट्टी बांध के....
नयन की जर्फ से वो झेलम हटा दो....!!!

लफ्ज दर लफ्ज ही रिस्ते रहते दर्द....
आस रूठने से पहले वो रेलम हटा दो....!!!

©खामोशियाँ

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

चेहरा


चेहरे पर चेहरा सजाये बैठे हैं....
खुद मुखौटों मे उलझाए बैठे हैं....!!


चाँदनी कितनी चलती साथ...
ढेबरी पाकिटों मे छुपाए बैठे हैं...!!

आमवास अकेली पीछा करती...
जुगनू हाथो मे गढ़वाए बैठे हैं....!!

उम्मीद का साथ एक-दो कदम...
तकदीर खुद की बनवाए बैठे हैं...!!

©खामोशियाँ

रविवार, 22 सितंबर 2013

अजनबी मुखौटे


ट्रेन के पावदान भी गिनते
हर रोज़ सबके निशान...!!

चलते मचलते
हवाओं पर पेंग मारते...
हर हचको पर
अलार्म टाँगे
लोगो को जगाया करते...!!

कुछ धूधली तस्वीरों बाद
अक्सर दोहरा जाते चेहरे...!!!
मुखौटे भी गिने चुने
खुदा के पास भी...
तभी पहना देता
उन्हे एक अरसे बाद...!!

खोज ज़रा...
किसी अजनबी शहर मे
अजनबी बना के...
मिलेगा किसी
टूटी टीन की छप्पर तले
चाय की मीठे चुसकियाँ मारते...!!

पहचान ना पाएगा तू....
खुद के अक्स को भी....!!

©खामोशियाँ-२०१३

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

किस्मत का खेल


रात अब तनहा कहाँ
चाँद जागता ना साथ...
पत्ते खेलने बैठते कि
सुबह चली आती ढ़ूढ़ने।


बेगम लापता....
बादशाह रूश्वा...
किसे मनाए क्या सुलझाए।

किस्मत का खेल
उम्मीदों से कोसों दूर।

©खामोशियाँ

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

चाँद की बैकलाइट


चाँद की बैकलाइट मे
आज भी दिखते हैं....
तेरे प्रॉजेक्टर पर के उतरे हुए दिन....!!

स्वप्न मे भी कैकटस लगे पड़े....
हल्की सी अड़चन भी
पूरी तस्वीर बर्बाद कर देती....!!

©खामोशियाँ

बूढ़ी लालटेन का नटखट बच्चा...


शाम को
सूरज के जाते जाते...
एक सांस मे गटक जाता
पूरी तेल का मटका...!!

उसकी जीभ पर
उभरे हर एक
फफोले साफ गिने जा रहे...!!

इतने गम
खुद पर लादे
हर पहर मटकता ही रहता...!!
एक बूढ़ी लालटेन का नटखट बच्चा...!!


©खामोशियाँ

शनिवार, 7 सितंबर 2013

इतिहासी पन्ने


उस कायनात
की चमकती चाभी...
चांदी के छल्लो मे
उरसकर चली गयी....!!!
कितने
सैयारे लांघते पहुंचा...
पर दरवाज़ो को जकड़े
भूरी आँखों वाले ताले...
हर आहट पर
बड़ी आस से ताकते...!!
और उस रोज़ सोचता
एक रात
चुपके से क्यूँ ना फाड़ दूँ
तेरी जुदाई के
हर वो इतिहासी पन्ने...!!


©खामोशियाँ

सोमवार, 2 सितंबर 2013

बदलते लिबास....!!


लोग कहाँ बदलते रुवाब बदल जाते....
पुराने जैकेट मे पड़े रुमाल बदल जाते...!!

लिबास छुपाए फिरते आजकल ए बशर...
सफ़ेद कुर्ते लगे गुलाब बदल जाते....!!

बड़ी शिद्दत से सोते पुरानी यादों मे ...
आँखों से चिपके पड़े ख्वाब बदल जाते....!!

©खामोशियाँ

झील


कितने जाल फैलाया....
......तारो को पकड़ने खातिर....

पर झील अकेली ठहरी....
..........कोई उतरा तक नहीं....!!!

शायद एक ढूढ़िया बटन....
..........फंसा गया काटें मे.....

फ़लक का कुर्ता फटा था
..........और चाँद भी गायब.....!!!

©खामोशियाँ

डोरे डालता चाँद


एक जमाने से....
चाँद पीछे पड़ा मेरे.....
रात होते ही डोरे डालता....!!

कभी खिड़की से झाँकता....
तो कभी...
आगन पर टेक लगाए रहता....!!

आजकल
दिखता नहीं....
अमावस लिए गयी लगता....!!

महसूस
करता...ना चाहते
भी आँखें लिए जाता...!!

ऊपर फ़लक पर....
निशान हैं आज भी
चमकते उसके पाँव के....!!

©खामोशियाँ

शनिवार, 17 अगस्त 2013

मज़ार की बयार


छत के अतरे
दुबकी बैठी पुरानी मज़ार....
उड़ा के
लिए जाती कौतूहल हज़ार....!!!

सैलाब की खामोशी
चुन्नट मे लपेटे....
उड़ती इर्द-गिर्द मीठी बयार....!!!

उम्मीद की ओढनी
कब तक थामेगी....
कभी तो
बाहर आएगी दबी चीखती पुकार....!!!

©खामोशियाँ-२०१३

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

धूप के जंगल


बांध के सब्र मे तुम...
ढूंढ लो गहराई भी....!!!
जिसमे उतार कर मैंने...
सुखाई हैं तनहाई भी...!!!

इन धूप के जंगलो से
बचाकर तराशा उसे...!!!
वरना कहाँ सरकती हैं...
आग मे पुरवाई भी...!!!

साथ उनके आने से
उठ पड़ी कब्रे...!!!
वरना कितने मुद्दतों से
पकड़ा था परछाई भी....!!!


©खामोशियाँ-२०१३

रविवार, 4 अगस्त 2013

बूढ़ा धुआँ


एक अकेली चिगारी पर...
कुल्लियाँ करती उफनाती बटुली...!!

उसपे फूँक मारने तरसती बयार...
एक बूढ़ा उठता धुआँ...
चिमनी पर चढ़ के...
चाँद मे समा गया....!!

दौड़के उसके पीछे कैसे...
काला साया लिए निशा...
भीग गयी पसीने से...!!

©खामोशियाँ-२०१३

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

लम्हे की दास्ताँ


कुछ दूर चल....

गिरा पड़ा ....
वक़्त की कारवां से कट कर लम्हा....!!

सुना हैं ......
उम्मीद की धूप थोड़ी देर रहेगी...!!

हिम्मत हैं तो .....
चल परछाइयों के निशान पकड़े...!!

मिल जाएगा लश्कर....
दर्द से बोझिल हुई साँझ से पहले....!!

©खामोशियाँ

सोमवार, 29 जुलाई 2013

टंकार


कुछ नयन मे भी पानी है
कुछ जघन विपत्ति भी आनी हैं....!!

क्या करू कुछ समझाओ...
कुछ मार्ग हमे भी सुलझाओ...!!

लड़ने की ललक ना कम होती
तन मन मे वो ज्वाला भरती...!!

यूं हम भी तो मतवाले हैं...
ना रुका ना रुकने वाले हैं....!!

ले आएंगे वो काँच कवच....
खुद ब्रम्हा ही बतलाएंगे सच...!!

जो दान दिये थे कर्ण ने...
या भीख लिए थे अर्जुन ने...!!

छीन के हम वो सब लाएँगे...
खुद अपना भाग्य बनाएँगे...!!


©खामोशियाँ

बुधवार, 24 जुलाई 2013

महगाई की मार:


कैसे कैसे दिन भी अब आने लगे हैं....
थैले पड़े टमाटर भी मुसकाने लगे हैं...!!

दिन गुजरता था सूखी रोटी पकड़े....
जमे घी रुपया भी पिघलाने लगे हैं...!!

चाय फीकी पड़ती आजकल की...
अदरक का स्वाद बंदर सुनाने लगे हैं....!!

सलाद मे कटे मिलता था कल तक....
आजकल प्याज़ भी आँखें मिलाने लगे हैं...!!

©खामोशियाँ

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

अकेला मकान...


खालिश शहरों के इंसान देखे हैं....
हमने करीब से कब्रिस्तान देखे हैं....!!

लोग ठहरते ही कहाँ आशियाने मे...
हमने अकेले मे रोते मकान देखे हैं....!!

तोड़कर रिश्तों की चारदीवारी को...
हमने रोज़ भागते समान देखे हैं...!!

अपनों की पूछ हैं ही कहाँ किसी को...
हमने गैरो की मन्नतें अज़ान देखे हैं...!!!

©खामोशियाँ

शनिवार, 20 जुलाई 2013

जंग की गंध


हवाओं की बेरुखी मे....
साफ मौजूद वियतनाम की चीखें...!!


घर-घरो के वारीस....
शमशान छेकाए बैठे....!!

ऊपर चीलम फूकता चीन...
बारूद-बोझल ऊंगता पड़ोसी का खेत...!!

इजराएल की सूखी रेत...
कितनो का खून निचोड़ेगी....!!

दुनियावालो का गुलाबी मांस...
कब तक खाएँगे ये बारूदी गिद्ध....!!

©खामोशियाँ

रविवार, 14 जुलाई 2013

मुसाफ़िर


कड़ी धूप पसरी हैं टटोलते आना....
इधर गुजरना उन्हे छोड़ते जाना...!!

इलाके रहेंगे जहां लोग ना ठहरते....
यादों के पिटारे बस छुपाते जाना...!!

रात की खामोशी पूछेगी रास्ता...
झींगुरों की आवाज़े बताते जाना...!!

आज देर रात ना जगेगी चाँदनी...
आना तो ज़रा उसे जगाते जाना...!!


©खामोशियाँ

शनिवार, 13 जुलाई 2013

फुर्सत


अंजुरियाँ रूठ गयी थी....कलम सिसक रहे थे....नोट पर गोजने खातिर देख कैसे तरस रहे थे....!!!
आज रहा ना गया बस लिख दिया कुछ ऊबड़ खाबड़ पंक्तियाँ भाव मे अंदर तक डूबना फिर बताना कैसा रहा सफर...ऊपर ऊपर तैरने पर गहराइयों का अंदाज़ा ना लगा पाओगे ए बशर...!!
तो पढ़िये ताज़ातरीन ग़ज़ल....!!

कितनों ने कितना जख्म बखश़ा है...
आज उसका हिसाब करने बैठा है...!!

ज़िंदगी भर काम आए जो वसूल....
आज उन्हे ही बंदा बेचने बैठा है...!!

जिन चिरागो ने तेल कभी नहीं पीया...
आज उनको जाम पिलाने बैठा है...!!

बदल जाती चाहने वालो की तस्वीर...
आज कल कौन दर्द भुलाने बैठा है...!!

गैरो को फुर्सत कहाँ अपने पास आने की...
आज अपना ही हमे रुलाने बैठा है...!!



©खामोशियाँ

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बाजू की विंडो सीट....!!


आज भी खाली रखता...
बाजू की विंडो सीट...!!

एक अक्स..............
...............एक आस
टहलती हैं इर्द-गिर्द...!!

उसे बैठाने..............
.............पास बुलाने
खातिर बहाने बनाता...!!

हर मंज़र...............
..................हर वादे
पीछे भाग रहे...!!

बस समय.............
................बस याद
थमी बैठी शिथिल...!!

फिर भी कहीं कभी जरूर....
भरेगी वो अकेली..........

.........बाजू की विंडो....!!


©खामोशियाँ

शनिवार, 29 जून 2013

यादों की बरसात:


हो गयी फुरसत उसके चंद अल्फ़ाज़ों के बाद...
चिराग भी जलता रहा बैठे बरसातों के पास..!!!

चाँद को देख अब्रो की आँचल मे कैद....
सितारा रोता रहा बने के सीपों की सांस...!!!

डरे...सहमे...दुबके...छुपके...
लिपटा रहता रखे जाने कितने एहसास...!!!

यादों की चादर बिछा के सो गया इस तरह...
बयार ने उतार दिया उसके चेहरे का लिबास...!!

©खामोशियाँ

शुक्रवार, 28 जून 2013

बेरोजगार


बेरोजगार
रोज़ भाव ढूंढता रहता...
बड़ी आस से किवाड़ खोलता...
कहीं कुछ मिले दांव उठाने को...!!

नज़्म की खोल से ऊपर तक..
यादें वादे मुंह छुपाती...!!

सुना हैं बारीक होते बटखरे...
चलो तोड़ तोड़ बेंच दूंगा...!!

सारे 24 कैरेट खरे
चमकते नींद के गोले...!!

अब इनसे बनती नहीं नींद की....!!

©खामोशियाँ

मंगलवार, 25 जून 2013

कुछ हुआ ही नहीं....!!


जगमगाते पीले आसमान के
कोरों से होकर...
आज भी सीधे
धंसते हैं तीखे तेवर..!!

जोर से चीखता बादल
मानो लग गयी फ़लक को
उधड़ गए हो महीन टांके...!!

बह रहा लहू
भीगे जा रहे सफ़ेद अब्र...
रो रहा कबसे
चुप ही नहीं होता....!!

और तुम कहते
कुछ हुआ ही नहीं....!!

©खामोशियाँ